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Aleksey Burkov, an IT freelancer from St. Petersburg, has been handed down a nine-year sentence in the US on charges of cyber fraud. The man spent more than four years in Israeli prisons after an arrest on Washington’s request.
American prosecutors sought 15 years in prison for Burkov who pleaded guilty for involvement in cyber-attacks and computer network fraud. They accused him of organizing a “cybercrime forum” for criminals of all sorts, allowing them to obtain stolen data, hacking services and malware as well as cut shady deals with each other.
Another website also organized by Burkov, according to the prosecutors, was selling more than 150,000 stolen credit card numbers, mostly taken from US financial institutions. The damage his action dealt to the US allegedly amounted to $20 million.
Burkov cut a deal with the investigators back in January and pleaded guilty to two out of five counts he was initially charged with. If found guilty of all the charges, he could have been sentenced to up to 80 years behind bars.
Calling himself a cyber security specialist and repeatedly denying all the charges at first, Burkov was arrested by Israeli authorities back in 2015 on an international warrant issued by the US. Speaking with RT last October, he said he had been “hijacked” and brought into custody after spending a holiday in Israel with his girlfriend, something that he described as a “standard US scheme.”
After that, he spent more than four years in Israeli prisons, with no access to healthcare or regular visits from his lawyers. Russia also filed an extradition request for Burkov and reportedly considered swapping him for Naama Issachar, a 25-year-old Israeli-American who was sentenced to seven years in prison in Russia on drug trafficking charges.
Israeli authorities were apparently reluctant to consider such a possibility and the question was never officially raised in bilateral talks. Eventually, Issachar was pardoned by President Vladimir Putin for “humanitarian reasons” in January 2020, after spending about 10 months behind bars. Burkov had been extradited by Israel to the US more than two months prior.
The Russian will have to spend three more years in a US prison, as the four years he already spent behind bars in Israel will count as part of his sentence. The judge also ordered him to serve his sentence in the DC area to facilitate some “future discussions” with his lawyer, for reasons the court did not consider necessary to explain to the broader public.
दिल्ली और मुंबई के बीच कोरोना के बढ़ते आंकड़ों की ऐसी रेस चल रही है जिसे कोई भी जीतना नहीं चाहेगा। यही दो महानगर हैं जो कोरोना संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। देश भर में कोरोना के जो कुल मामले सामने आए हैं, उनमें से लगभग 30 प्रतिशत सिर्फ इन दो शहरों से ही हैं।
दिल्ली में कोरोना का पहला मामला 2 मार्च को सामने आया था। वहीं, मुंबई में पहला मामला इसके 9 दिन बाद दर्ज किया गया, लेकिन फिर यह संक्रमण बेहद तेजी से फैला। स्थिति यह बन पड़ी कि मई के आखिर तक मुंबई में कुल 39,686 मामले दर्ज हो चुके थे। जबकि इस वक्त तक दिल्ली में संक्रमितों की कुल संख्या 19,844 थी। यानी मुंबई की तुलना में लगभग आधी।
यह वो समय था जब तक देशभर में लॉकडाउन का सख्ती से पालन हो रहा था। लेकिन, जून आते-आते लॉकडाउन में ढील दिए जाने की आवाजें तेज होने लगी थीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इनमें मुख्य थे जो लॉकडाउन को खत्म करने की जोर-शोर से पैरवी कर रहे थे। लेकिन लॉकडाउन का हटना सबसे घातक दिल्ली के लिए ही साबित हुआ है।
जहां मई के अंत तक दिल्ली में संक्रमितों की कुल संख्या 20 हजार से नीचे थी, वहीं जून में इसमें करीब 50 हजार का इजाफा हुआ और यह 70 हजार के पार हो गई। इन आंकड़ों के साथ ही मुंबई को पछाड़ते हुए दिल्ली सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमितों वाला शहर बन गया।
कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा
लॉकडाउन हटने के साथ ही दिल्ली में कोरोना से मरने वालों की संख्या भी लगभग 5 गुना तक बढ़ गई है। मई के अंत तक दिल्ली में कोरोना के चलते कुल 473 मौतें हुई थीं। लेकिन जून शुरू होते ही यह आंकड़ा इस तेजी से बढ़ा कि महीने के शुरुआती आठ दिनों में ही लगभग दोगुना हो गया और 15 जून तक कुल 1400 लोग इस संक्रमण के चलते मारे गए।
बीते दस दिनों में कोरोना से होने वाली मौतों का यह सिलसिला लगभग इसी तेजी से बरकरार है। 26 जून तक दिल्ली में कुल 2 हजार 429 लोग कोरोना के चलते अपनी जान गंवा चुके हैं। हालांकि, मुंबई की तुलना मेंयह आंकड़ा अब भी काफी कम है जहां चार हजार से ज्यादा लोग इस संक्रमण से मारे जा चुके हैं। मृत्यु दर की बात करें तो वह भी दिल्ली में 3 प्रतिशत के ही करीब है जबकि मुंबई में यह दर 5 प्रतिशत है।
बढ़ते मामलों की एक वजह टेस्ट में आई तेजी
दिल्ली में कोरोना से संक्रमितों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है। लेकिन, कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे दिल्ली के बेकाबू हालात नहीं बल्कि लगातार बढ़ रही टेस्टिंग मुख्य कारण है। बीते कुछ हफ्तों में दिल्ली में प्रतिदिन होने वाली टेस्टिंग तीन गुना तक बढ़ाई गई है। पहले जहां औसतन 5-6 हजार लोगों का ही कोरोना टेस्ट रोजाना हो रहा था, वहीं अब 16 हजार से ज्यादा लोगों के टेस्ट प्रतिदिन किए जा रहे हैं। मुंबई की तुलना में टेस्टिंग का यह आंकड़ा काफी ज्यादा है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को प्रेस को संबोधित करते हुए कहा है, ‘हमने कोरोना टेस्टिंग की क्षमता तीन गुना तक बढ़ा दी है लेकिन हर रोज करीब तीन हजार मामले ही बढ़ रहे हैं। कुल मरीजों में करीब 45 हजार लोग ठीक भी हुए हैं।’ उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल प्रदेश में कुल 26 हजार सक्रिय मामले हैं।
उन्होंने कहा, ‘रोजाना तीन हजार मामले आने के बावजूद पिछले एक हफ्ते में अस्पतालों में छह हजार लोग भर्ती हुए हैं। दिल्ली में कोरोना संक्रमण हल्के लक्षणों वाले हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराए जाने की जरूरत नहीं है। फिलहाल हमारे पास 13,500 बिस्तर तैयार हैं।”
दक्षिणी दिल्ली के छतरपुर इलाके में राधा स्वामी सत्संग व्यास के परिसर में दुनिया का सबसे बड़ा कोविड सेंटर बन रहा है। यहां 10 हजार बेड होंगे।
कंटेनमेंट जोन में डोर टू डोर टेस्टिंग
दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने शुक्रवार को बताया कि दिल्ली के सभी कंटेनमेंट जोन में हर एक घर में जाकर टेस्टिंग की जाएगी। फिलहाल दिल्ली में कुल 227 कंटेनमेंट जोन हैं। सिसोदिया ने एक मीडिया समूह से बात करते हुए कहा है कि ‘सरकार के नए कोविड रिस्पॉन्स प्लान के अंतर्गत कंटेनमेंट जोन में रहने वाले सभी लोगों का अनिवार्य रूप से कोरोना टेस्ट किया जाएगा। 27 जून से हम दिल्ली में एंटी-बॉडी टेस्ट भी शुरू करने जा रहे हैं। इस टेस्ट के जरिए पता चलेगा कि क्या कोई व्यक्ति पहले ही कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद ठीक हो चुका है।’
बीते एक हफ्ते के अनुभवों को कुछ बेहतर मानते हुए मनीष सिसोदिया ने कहा है, ‘पहले हम हर रोज करीब 6 से 7 हजार लोगों का टेस्ट कर रहे थे, जिनमें से करीब दो हजार लोग पॉजिटिव मिलते थे। लेकिन अब हर रोज करीब 18 हजार टेस्ट हो रहे हैं और उनमें से लगभग 3 हजार लोग पॉजिटिव मिल रहे हैं। यह एक अच्छा संकेत है। दिल्ली में मरीजों का रिकवरी रेट भी पहले की तुलना में बेहतर हुआ है। यह 41 फीसदी से बढ़कर अब 58 फीसदी है। इसके अलावा दिल्ली में कोरोना वायरस के मामलों की वृद्धि दर भी 5.8 प्रतिशत से घटकर 4.9 प्रतिशत रह गई है।’
सार्वजनिक यातायात बड़ी चुनौती
दिल्ली की लाइफलाइन कही जाने वाली दिल्ली मेट्रो बीते तीन महीनों से बंद है। यह कब शुरू होगी, इस बारे में फिलहाल कोई जानकारी भी दिल्ली मेट्रो ने नहीं दी है। आम दिनों में लगभग 15 लाख लोग दिल्ली मेट्रो में प्रतिदिन सफर करते हैं और यह मेट्रो 2700 से ज्यादा ट्रिप हर रोज लगाती हैं। कोरोना संक्रमण से दिल्ली मेट्रो पूरी तरह बंद हैं और इसने प्रदेश में लोकल यातायात को बेहद कठिन बना दिया है।
ऐसे में यात्रियों का पूरा भार फिलहाल डीटीसी बसों पर आ गया है। लेकिन ये भी सीमित संख्या में ही चलाई जा रही हैं। डीटीसी के पास करीब 6 हज़ार बसें हैं जिनमें से आधी ही फिलहाल चलाई जा रही हैं। इनमें से भी करीब 700 बसें पुलिस को स्पेशल ड्यूटी के लिए दी गई हैं। बाकी बची बसें यात्रियों के लिए चल रही हैं लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए इन बसों में सिर्फ 20 यात्री प्रति बस ही सवारी कर सकते हैं। लिहाजा अधिकतर बस स्टैंड पर पहुंचने से पहले ही बसें पूरी भर चुकी होती हैं।
यह बसें इतनी कम संख्या में क्यों चलाई जा रही है? यह सवाल करने पर डीटीसी के एक अधिकारी बताते हैं, ‘हमारे कई ड्राइवर कंटेनमेंट जोन के रहने वाले हैं इसलिए नहीं आ पा रहे। कुछ खुद कोरोना पॉजिटिव निकले हैं और कई 55 साल से ऊपर हैं। लेकिन फिर भी हमारी कोशिश है कि ऑफिस आने-जाने वाले समय पर कम से कम हम ज्यादा से ज्याजा बसें निकाल सकें।’
31 जुलाई तक बंद रहेंगे दिल्ली के स्कूल
दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने शुक्रवार को हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद यह घोषणा की कि दिल्ली के सभी स्कूल 31 जुलाई तक पूरी तरह बंद रहेंगे। इस बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि इस साल सिलेबस को 50 प्रतिशत तक कम भी किया जा सकता है। इस बैठक का उद्देश्य यह भी तय करना था कि कोरोना संक्रमण के बाद जब स्कूल खोले जाएं तो उसके लिए किस-किस तरह की तैयारी जरूरी है। इस सम्बंध में दिल्ली सरकार ने कई शिक्षकों और अभिभावकों के सुझाव भी मांगे थे।
इन सुझावों में मुख्य यह थे कि सीमित छात्रों की हफ्ते में सिर्फ एक या दो क्लास आयोजित की जाएं, यह वैकल्पिक दिनों के अनुसार हों, सभी क्लास सैनिटाइज की जाएं, छात्रों को मास्क बांटें जाएं, स्कूल में दाखिल होते समय हर छात्र की थर्मल स्क्रीनिंग हो, सिलेबस कम किया जाए, ज्यादा से ज्यादा क्लास ऑनलाइन की जाएं और सामूहिक गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। इन तमाम सुझावों पर चर्चा करते हुए शिक्षा मंत्री ने कहा है कि हम इन्हें ध्यान में रखते हुए ऐसी योजना बनाने का प्रयास करेंगे जो छात्रों को कोरोना के साथ जीना भी सिखाए और नई चुनौतियों के लिए उन्हें तैयार भी करे।
कोरोनावायरस प्रेग्नेंट महिलाओं पर कहर बनकर बरपा है। पिछले दिनों दिल्ली के बिजेंद्र सिंह अपनी प्रेग्नेंट पत्नी को लेबर पेन होने के बाद एक-एक करके 8 अस्पतालों में लेकर गए, लेकिन किसी ने कोरोना की वजह से भर्ती नहीं किया। आखिरकार 15 घंटे बाद उनकी पत्नी की मौत हो गई।
कुछ ऐसा हीपापुआ न्यू गिनी में भी हुआ था। वहां एक प्रेग्नेंट महिला इलाज के लिए अस्पताल पहुंची, उसे ब्लड प्रेशर की शिकायत थी।अस्पताल वालों ने कोरोना के डर से उसे भर्ती ही नहीं किया। कुछ दिनों बाद वह अंधी हो गई और उसका बच्चा भीनहीं बच सका।
कोरोनाकाल में इस तरह के कई वाकये सामने आए हैं।संक्रमण के डर से कई महिलाओं ने अस्पताल जाने की बजाए घर मेंही डिलिवरी का प्लान बनाया जो बाद में उनके लिए मुसीबत साबित हुआ। हाल ही में बांग्लादेश के ढाका में इस तरह का मामला सामने आया था।
यह फोटो पापुआ न्यू गिनीके पोर्ट मोरेस्बी जनरल अस्पताल की है, जहां कोरोना संक्रमित प्रेग्नेंट महिलाएं भर्ती हैं।
ग्रामीण और स्लम एरिया में रहने वाली महिलाओं को इस दौरान सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वजह, सरकारी अस्पतालों में कोरोना के कारण जगह नहीं मिलना या बेड उपलब्ध नहीं होना है। यहां तक कि उन्हें लोकल ट्रीटमेंट भी नहीं मिल सका।
संक्रमण के डर से दुनिया के कई विशेषज्ञ कुछ समय के लिए प्रेग्नेंसी अवॉयड करने की सलाह दे रहे हैं। क्योंकि, संक्रमण का खतरा तो हैही साथ ही इस समयप्रॉपर इलाज भी नहीं मिल पा रहा है। इस समय पैदा होने वाले ज्यादातर बच्चों को टीका भी नहीं लग पा रहा है।
प्रेग्नेंट महिलाओं को इंटेंसिव केयर की जरूरत
प्रेगनेंसीके दौरान महिलाओं को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस दौरान ब्लड फ्लो, मेटाबोलिज्म और हार्ट रेट बढ़ जाता है। इसके साथ ही इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है। इस वजह से सांस लेने में तकलीफ, रेस्पिरेटरी डिसीज और इनफ्लुएंजा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
इस वजह सेमहिलाओं को इंटेंसिव केयर की जरूरत होती है। एक इंटरनेशनल स्टडीज के मुताबिक 96% कोरोना पॉजिटिव महिलाओं में निमोनिया के लक्षण पाए गए।
जन्म के समय या उसके बाद मां से संपर्क में आने के कारण कई बच्चे पैदा होते ही संक्रमण का शिकार हो गए।
भारत में करीब 11 फीसदी प्रेग्नेंट महिलाएं आईसीयू में
सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने हाल ही में अमेरिका में कोरोना संक्रमित प्रेग्नेंट महिलाओं पर एक रिसर्च की है। इसके मुताबिक, 31% प्रेग्नेंट महिलाओं को कोरोना की वजह से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इनमें से 1.5 % आईसीयू में और 0.5 फीसदी महिलाओं को वेंटिलेटर पर रखा गया। वहीं, इसके मुकाबले सिर्फ 6 फीसदी नॉन प्रेग्नेंट महिलाएं ही अस्पताल में दाखिल हुईं। अगर भारत की बात करें तो करीब 11 फीसदी प्रेग्नेंट महिलाओं को आईसीयू में रहना पड़ा।
प्रीमैच्योर डिलीवरी
कोरोना की वजह से ज्यादातर महिलाओं कोप्रीमैच्योर डिलीवरी फेस करना पड़ेगी। कोरोनाकाल से पहले दुनियाभर में करीब 13.6 फीसदीप्रीमैच्योर डिलीवरी होती थीं, लेकिन अब यह आंकड़ा दोगुना यानी 26% हो गया है।
11.6 करोड़बच्चों का जन्म कोरोनाकाल में हुआ
संक्रमित महिलाओं के बच्चों पर भी कोरोना का असर देखने को मिला है। जन्म के समय या उसके बाद मां से संपर्क में आने के कारण कई बच्चे पैदा होते ही संक्रमण का शिकार हो गए। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक 11.6 करोड़बच्चों का जन्म कोरोनाकाल में हुआ है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, नॉर्मल डिलिवरी वाले 2.7 फीसदी बच्चे कोरोना पॉजिटिव पाए गए, जबकि जिन बच्चों का जन्म सिजेरियन के जरिए हुआ, उनमें 5% संक्रमित हुए। यानी लगभग 8 फीसदी बच्चे अपनी मां की वजह से कोरोना का शिकार हुए।
कोरोना का असर ब्रेस्ट फीडिंग पर भी हुआ है। संक्रमण के डर से मांएं अपने बच्चे को दूध नहीं पिला रहीं। इससे बच्चों के इम्यून सिस्टम पर असर पड़ सकता है। हालांकि, सीडीसी के अध्ययन के मुताबिक सुरक्षा के मानकों को ध्यान में रखकर ब्रेस्ट फीडिंग कराई जा सकतीहै।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कोरोनाकाल में पैदा होने वाले करीब 8 % बच्चे रेस्पिरेटरी डिसीज का शिकार हुए हैं।
दुनियाभर में 4.7 करोड़ से ज्यादा अनवांटेड प्रेगनेंसी
कोरोनावायरस और लॉकडाउन के चलते कई महिलाएं अनवांटेड प्रेगनेंसी कीशिकार हो गईं। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में4.7 करोड़से अधिक महिलाएं लॉकडाउन के कारण अनवांटेड प्रेगनेंसी की शिकार हुई हैं।
एफआरएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 23 लाख महिलाओं को अनचाहा गर्भधारण करना पड़ा है।इसके पीछे मुख्य वजह लॉकडाउन के दौरान महिलाओं को बर्थ कंट्रोल और कॉन्ट्रासेप्टिवपिल्स की दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक, करीब 2 करोड़ कपल को इन मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।
एफआरएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 23 लाख महिलाओं को अनचाहा गर्भधारण करना पड़ा है।
भारत में 10 फीसदी एबॉर्शन बढ़ेगा
भारत में हर साल करीब 1.5 करोड़ एबॉर्शन होते हैं।एक रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन के चलते14 लाख एबॉर्शन के मामलेबढ़ेंगे। जिसमें 8 लाख से ज्यादा अनसेफ एबॉर्शन होंगे। करीब 18 सौ प्रेग्नेंट महिलाओं की जान भी जा सकती है। वहीं दुनियाभर में करीब 17 फीसदी मैटरनल डेथबढ़ने की आशंका है।
ऑनलाइन मेडिकल चेकअप
कोरोनाकी वजह से ज्यादातर गर्भवती महिलाएं ऑनलाइन मेडिकल चेकअप करा रही हैं। लॉकडाउन के दौरान वाहन नहीं मिलने से कई प्रेग्नेंट महिलाएं रेगुलर चेकअप के लिए अस्पताल नहीं पहुंच पाईं। उन्होंने ऑनलाइन मेडिकल सहायताऔर फोन पर डॉक्टरों की सलाह ली।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ऑक्स-बो लेक (झील) चिल्का के बीचबसे करीब 100 से अधिक गांवों के डेढ़ लाख लोगों की आजीविका मछली पर ही टिकी है। जाति कोई भी हो, यहां सब मछुआरे ही हैं। कोरोनाकाल में यहां की मछलियों की डिमांड कम हो गई है। सिर्फ 10% सप्लाई ही कोलकाता या दूसरे जगहों पर हो पा रही हैं।
चिल्का लेक में 160 से भी ज्यादा प्रकार की मछलियों मौजूद हैं। बोटिंग के साथ-साथ यहां फिशिंग करने की सुविधा भी है।
यहां इरावदी डॉल्फिनसबसे ज्यादा पाई जाती हैं
70 किलोमीटर लंबी और 30 किमी चौड़ी इस झील का पानी दिसंबर से जून तक खारा रहता है, लेकिनबरसात में मीठा हो जाता है। यहां पर कई लोग सेव चिल्का की टोपी पहने दिखाई दे जाते हैं, जो यहां की बायोडायवर्सिटी,प्रवासी पक्षियों और मशहूर डॉल्फिन को बचाने के लिए लोगों को जागरूक करते हैं। इरावदी प्रजाति की डॉल्फिन यहांसबसे अधिक संख्या में पाई जाती हैं।
चिल्का के पास बसे करीब 100 गांवों के लिए मछली ही आय का मुख्य सोर्स है, कोरोना की वजह से इसकी डिमांड कम हो गई है।
चिल्का झील अपनी खूबसूरती के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं। यहां 6 विशाल द्वीप हैं- परीकुड़, फूलबाड़ी, बेराहपुरा, नुआपारा, नलबाड़ा और तम्पारा। येसभी पुरी जिले के कृष्णा प्रसाद राजस्व क्षेत्र का हिस्सा हैं। झील का उत्तरी किनारा खोर्दा जिले और पश्चिमी तट गंजाम जिले से लगता है।
एमएल चिल्कारानी दिन में 4 फेरे लगाती हैं, जिसमें बैठकर लोग नौका विहार का आनंद लेते हैं।
कोरोना की वजह से व्यापार को घाटा
आलूपटना गांव में करीब 5 सौमछुआरे हैं। गांव के ही अरुप कुमार जेना बताते हैं कि कोरोना के पहले हम 15 किलो तक मछलियां पकड़ लेते थे। आज 4-5 किलो ही निकाल पाते हैं कि क्योंकि अब न तो ग्राहक हैं न बाजार हैं और न ही सही रेट मिल पा रहा है।पहले यहां आने वाले टूरिस्ट से भी कमाई होती थी,वह भी मार्च से बंद है।
चिल्का में करीब 200 टूरिस्ट बोट हैं, जो कोरोना की वजह से बीते चार महीने से बंद है।
वे बताते हैं मछली और टूरिस्ट से रोजाना करीब 15 सौ से 2 हजार रुपए तककी कमाई हो जाती थी, जोअब 400-500 पर टिक गई है। टूरिस्ट सीजन में यहां साढ़े तीन घंटे के नौका विहार का रेट 1700 रुपए और एक घंटे का 800 रुपए होता है।
यहां 200 टूरिस्ट बोट हैं जो बीते 4 महीनोंसे सब बंद हैं। सातपाड़ा से कृष्णाप्रसाद के लिए फेरी सर्विस भी है। एमएल चिल्कारानी दिन में 4 फेरे लगाती हैं। ब्रह्मपुर, महिषि जैसे गांवों के लिएनाव भी चलती हैं।
गर्मी के मौसम में यहां भारी संख्या में टूरिस्ट आते हैं, उनके लिए यह एक फेवरेट डेस्टिनेशन है।
झील के बीच में कृष्णाप्रसाद ब्लॉक है। इसमें 15 पंचायतें आती हैं। यहीं सातपाड़ा है, जो 7 छोटे-छोटे टोले से बना है। चिल्का से तीन जिले की बाउंड्री लगती है- गंजम, खुर्दा और पुरी। इस झील के पूर्व में बंगाल की खाड़ी है।
चीन के मुद्दे पर कांग्रेस-भाजपा की बयानबाजी में राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा ने इस फाउंडेशन को चीन से फंडिंग मिलने और यूपीए के समय में जरूरतमंदों का पैसा डायवर्ट करने का मुद्दा उठाया है।
राजीव गांधी फाउंडेशन क्या है?
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए 21 जून 1991 को सोनिया गांधी ने इस फाउंडेशन की शुरुआत की थी। ये फाउंडेशन एजुकेशन, साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रमोशन, शोषित (अंडरप्रिवलेज्ड) और दिव्यांगों के एम्पावरमेंट के लिए काम करती है। डोनेशन और इन्वेस्टमेंट पर मिलने वाले रिटर्न से इसका काम चलता है। सोनिया गांधी इसकी चेयरपर्सन हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और पी. चिदंबरम ट्रस्टी हैं।
फाउंडेशन पर अभी विवाद क्यों?
भाजपा का पहला आरोप- चीन से फंडिंग मिली
भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुरुवार को कहा कि 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से 3 लाख डॉलर (तब 90 लाख रुपए) मिले थे। फांउडेशन की एनुअल रिपोर्ट के आधार पर यह दावा किया गया। 2005-06 की एनुअल रिपोर्ट में फाउंडेशन को डोनेशन देने वालों की लिस्ट में चीन का भी नाम है।
दूसरा आरोप- यूपीए के समय पीएम रिलीफ फंड का पैसा डायवर्ट किया
नड्डा ने शु्क्रवार को कहा कि यूपीए के समय प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड (पीएमएनआरएफ) का पैसा राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ) को दिया गया था। सोनिया पीएमएनआरएफ के बोर्ड में भी थीं और आरजीएफ की अध्यक्ष भी थीं। ये दावे का आधार भी आरजीएफ की 2005-06 और 2007-08 की एनुअल रिपोर्ट को बनाया। दोनों रिपोर्ट में डोनेशन देने वालों की लिस्ट में पीएमएनआरएफ शामिल है।
राजीव गांधी फाउंडेशन की फंडिंग पर 9 साल पहले भी विवाद हुआ था
आतंकियों से रिश्ते होने के आरोपी जाकिर नाइक की इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन ने 2011 में राजीव गांधी फाउंडेशन को 50 लाख रुपए दिए थे। हालांकि, कांग्रेस ने बाद में रकम लौटा दी थी। भाजपा ने तब भी कहा था कि रकम लौटाकर लोगों को बेवकूफ बनाया गया है। भाजपा नेता आरपी सिंह ने कहा था कि नाइक के खिलाफ जांच चल रही है, इसलिए कांग्रेस ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए रकम लौटा दी।
जाकिर नाइक करीब साढ़े तीन साल से मलेशिया में है। गिरफ्तारी के डर से वह 2016 में भाग गया था। भारत में उसके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग और कट्टरता बढ़ाने का केस दर्ज है। जून 2017 में कोर्ट ने उसे भगोड़ा अपराधी घोषित किया था।
प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड क्या है?
1948 में उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यह फंड बनाया था। पाकिस्तान से विस्थापित लोगों की मदद करने के लिए यह फंड बनाया गया। बाद में दूसरे जरूरतमंदों के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा। इसकी रकम से अब बाढ़, तूफान और भूकंप जैसी आपदाओं में मारे जाने वाले लोगों के परिवारों की मदद की जाती है। हार्ट सर्जरी, किडनी ट्रांसप्लांट और कैंसर के इलाज के लिए भी जरूरतमंदों को आर्थिक मदद दी जाती है। एसिड अटैक के पीड़ियो की भी मदद की जाती है। इसका मैनेजमेंट प्रधानमंत्री के हाथों में रहता है। इस फंड में कोई भी इंडिविजुअल, ऑर्गेनाइजेशन, ट्रस्ट, कंपनी या इंस्टीट्यूशन दान दे सकता है। दान की रकम पर इनकम टैक्स में छूट मिलती है।
विवाद की कड़ियां कोरोना पर बने पीएम-केयर्स फंड से भी जुड़ीं
कोरोना जैसी महामारियों की स्थिति में प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए मार्च में ही एक ट्रस्ट के तौर पर पीएम-केयर्स फंड का ऐलान किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम लोगों से लेकर कॉर्पोरेट्स और सेलेब्रिटीज तक से इस फंड में कंट्रीब्यूशन देने की अपील की थी। इस फंड के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं। रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री को भी ट्रस्टी बनाया गया है। प्रधानमंत्री के पास यह अधिकार है कि वे रिसर्च, हेल्थ, साइंस, सोशल वर्क, लॉ, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और फिलान्थ्रॉपी फील्ड से तीन लोगों को ट्रस्ट में नॉमिनेट कर सकते हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम-केयर्स फंड पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जब पीएम रिलीफ फंड पहले से था तो फिर अलग से पीएम-केयर्स बनाने की क्या जरूरत थी? सोनिया ने कहा था कि पीएम-केयर्स की पूरी रकम पीएम रिलीफ फंड में ट्रांसफर की जानी चाहिए, जिससे ऑडिट हो सके और ट्रांसपेरेंसी बनी रहे।