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Friday, May 15, 2020

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गोवा में एक बार फिर कोरोना ने दस्तक दे दी हैजबकि यह राज्य पहले कोरोना मुक्त घोषित हो चुका था। गोवा में बुधवार रात कोरोना के 7 नए मरीज मिले। इसके पहले यहां करीब 40 दिन पहले यानी 3 अप्रैल को कोरोना का आखिरी मरीज मिला था। पहले के सभी सात मरीजों के ठीक होने के बाद 17 अप्रैल को राज्य कोरोना मुक्त घोषित किया गया था। नए मरीजों में से 5 एक ही परिवार के हैं। लॉकडाउन में ढील के बाद ही यह परिवार महाराष्ट्र से गोवा लौटा था। इनके अलावा दो और पॉजिटिव मरीज ट्रक ड्राइवर हैं।

लॉकडाउन के बीच विदेश से आए करीब 6500 पर्यटक लौट चुके हैं। ये पयर्टक जर्मनी, इटली, पोलैंड, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और स्विट्जरलैंड के थे, जिन्हें इनके देशों ने विशेष फ्लाइट भेजकर वापस बुला लिया। अभी करीब एक हजार विदेशी सैलानी यहां फंसे हुए हैं।

लॉकडाउन की वजह से टूरिज्म इंडस्ट्री पूरी तरह से ठप है

इधर, नए कोविड नियमों के साथ गोवा के बाजार अब खुल चुके हैं। पणजी का बाजार पूरी तरह से खुला है, लेकिन राज्य की आर्थिक व्यवस्था को काफी धक्का लगा है। पटरी पर आने में गोवा को समय लगेगा। राज्य का आर्थिक आधार मुख्य तौर पर तीन इंड्स्ट्रीज पर हैं- टूरिज्म, माइनिंग और फार्मास्युटिकल। इसमें कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से टूरिज्म इंडस्ट्री पूरी तरह से ठप है।

ट्रेवल एंड टूरिज्म एसोसिएशन के वाइस प्रेसीडेंट जैक अजीत सुखीजा बताते हैं कि लॉकडाउन के चलते टूरिज्म इंडस्ट्री को तकरीबन 1200 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। तमाम होटल, गेस्ट हाउस और रेस्तरां बंद हैं। गोवा में 4,000 होटल और गेस्ट हाउस हैं जो एकदम खाली हैं। अभी बारिश का सीजन शुरू होने वाला है, इसलिए लॉकडाउन खुलने के बावजूद टूरिस्ट नहीं आएंगे।

गोवा में ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरर्स को बसें चलाने के लिए भी कह दिया गया है। हालांकि, यहां के बड़े ट्रांसपोर्टर दामोदर मांदरेकर कहते हैं- मेेरे पास 14 बसें हैं। परमिशन मिल चुकी है, लेकिन खाली बस लेकर जाऊं कहां, क्योंकि टूरिस्ट तो है ही नहीं। पहले मेरे पास बड़े-बड़े ग्रुप भोपाल, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ से आते रहे हैं। इधर, राज्य में टैक्सी सेवा भी शुरू हो चुकी हैं।

नॉर्थ गोवा के बीचफिलहाल खाली हैं

गोवा में छोटे-बड़े कुल 48 बीच हैं। नॉर्थ गोवा के बीच बाघा, अंजुना, कलंगुट आदि पर ज्यादा भीड़ आम दिनों में रहती है, लेकिन फिलहाल ये खाली हैं। यहां स्पोर्टस गतिविधियां थमी हुई हैं। साउथ गोवा महंगा है।वहां ज्यादातर विदेशी सैलानी या पैसे वाले लोग जाते हैं। हर बीच पर करीब 100 रिटेल दुकानें हैं, जो फिलहाल बंद हैं। गोवा में काजू, रस बेरी, नारियल, लोकल वाइन की बिक्री भी टूरिस्टों की वजह से ज्यादा होती है, जो फिलहाल बंद हैं।

जैक अजीत सुखीजा का कहना है कि वे सरकार पर टूरिज्म शुरू करने को लेकर दबाव इसलिए नहीं बना सकते, क्योंकि अगर कोई सैलानी रेड जोन से यहां आता है तो गोवा फिर से दिक्कत में आ जाएगा। बता दें कि गोवा में एक साल में 3 लाख विदेशी, 17 लाख भारतीय सैलानी पहुंचते हैं।

गोवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष संकल्प अमोनकर कहते हैं- माइनिंग के अलावा गोवा के पास आर्थिक हालत ठीक करने का फिलहाल कोई रास्ता नजर नहीं रहा है। दिल्ली से गोवा के लिए ट्रेन शुरू की गई है। इससे गोवा में फिर कोरोना के केस आ सकते हैं। गोवा भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना का कहना है कि कोरोना के लिए गोवा में भी वही नियम लागू थे, जो बाकी देश के लिए थे। गोवा की जनता ने सख्ती से लॉकडाउन का पालन किया।

रेंडम टेस्ट और विदेशी पर्यटकों को ट्रेस कर कोरोना को फैलने से रोका
गोवा कोरोना के खिलाफ ठोस कदम उठाने वाले शुरुआती राज्यों में से एक है। लॉकडाउन, रैंडम सैंपलिंग, जागरूकता अभियान और लगातार ट्रैकिंग ने अहम भूमिका निभाई। गोवा ने राज्य में ही टेस्टिंग के लिए लैब स्थापित की। विदेश से आए पर्यटकों को ट्रेस किया। शुरुआती 7 में से 6 संक्रमित मुंबई से एक शिप से आए थे। ये लोग जहां भी गए थे, उन स्थानों पर रैंडम सैंपलिंग की गई।

रैंडम सैंपलिंग करने वाला गोवा पहला राज्य बना। गोवा कर्नाटक, महाराष्ट्र और केरल जैसे हॉटस्पॉट से घिरा हुआ है। ऐसे में सीमाई इलाकों और औद्योगिक इलाकों में कियोस्क स्थापित किए गए, जहां से सैंपल लेना आसान हो गया। डोर से डोर सर्वे किया और संदिग्ध मिले करीब 5 हजार लोगों का सैंपल लिया। जब कोरोना शुरू हुआ था तब राज्य में 100 वेंटिलेंटर का सेटअप था। इसे बढ़ाकर 400 कर दिया गया।



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तस्वीर गोवा की राजधानी पणजी के मीरामार बीच की है। यह पणजी के दो प्रमुख समुद्र तटों में से एक है। लॉकडाउन के ढील के बावजूद यह सूना पड़ा है। सामान्य दिनों में यहां भीड़ रहती है।


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कोरोना प्रभावित अर्जेंटीना में पहली बार संसद की कार्यवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई। इसमें 72 में से 70 सांसद यानी 97% उपस्थित रहे। इसके लिए संसद की इमारत में दो बड़ी स्क्रीन लगाई गई। दो कनेक्शन लिए गए। पहली स्क्रीन भाषण और वोटिंग के लिए थी। जबकि दूसरी स्क्रीन सांसदों के रजिस्ट्रेशन और उनकी पहचान प्रमाणित करने के लिए लगाई गई थी।

सत्र के दौरान कुछ सांसद ही सदन में मौजूद थे। इन सभी ने भी सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन किया। अजेंटीना में अब तक कोरोना के 6879 मामले सामने आए हैं। जबकि इससे 344 लोगों की मौत हो चुकी है। यहां 2385 लोग ठीक हो चुके हैं।दुनिया के 23 देशों में संसद के सत्र, पैनल मीटिंग इसी तरह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की जा रही हैं।

सत्र के दौरान कुछ सांसद ही सदन में मौजूद थे। इन सभी ने भी सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन किया।

न्यूजीलैंड:पिछले तीन दिन में कोई नया केस नहीं, 1497 संक्रमित

न्यूजीलैंड में गुरुवार को लगातार तीसरे दिन कोरोना का कोई नया मामला सामने नहीं आया। इससे पहले बुध‌वार आधी रात को 51 दिनों से जारी लॉकडाउन खत्म कर दिया गया। लोग 12 बजते ही वेलिंगटन, क्राइस्टचर्च समेत कई शहरों में हेयर सैलून पर पहुंच गए थे।

सरकार ने लोगों से आग्रह किया है कि देश में मॉल, दुकानें और रेस्तरां खोले जा रहे हैं लेकिन, नागरिकों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना होगा। एक स्थान पर 10 से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी होगी। पीएम जसिंदा अर्दर्न ने कहा है कि देश वायरस के कारण सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण आर्थिक स्थितियों का सामना कर रहा है।

उन्होंने कहा,‘न्यूजीलैंड में शीतकाल बेहद मुश्किलों भरा होने वाला है पर हर शीत ऋतु के बाद वसंत आता है और अगर हम सही निर्णय लेते हैं तो हम न्यूजीलैंड के निवासियों को वापस काम पर ले जा सकते हैं, हमारी अर्थव्यस्था फिर से तेजी से चल पड़ेगी।' न्यूजीलैंड कोरोना को काबू रखने में बहुत हद तक कामयाब रहा है। यहां 1497 मामले हैं। वहीं अब तक सिर्फ 21 लोगों की मौत हुई है।

रात 12 बजते ही बड़ी संख्या में लोग हेयर सैलून पहुंच गए।


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दुनिया के 23 देशों में संसद के सत्र, पैनल मीटिंग इसी तरह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की जा रही हैं।


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22 मार्च को हुए लॉकडाउन के बाद से देश के सभी बड़े मंदिरों में श्रद्धालुओं-दानदाताओं का चढ़ावा आना लगभग बंद है। ऐसे में मंदिरों को अपनी जमा पूंजी के सहारे ही संचालन करना पड़ रहा है। देश में सबसे अधिक संपत्ति वाले केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर में हर महीने करीब 3 करोड़ रुपए दान में आते थे, लेकिन लॉकडाउन में सिर्फ 25 हजार रुपए का दान आया। वैष्णो देवी मंदिर जहां ऑनलाइन दान लेने के विकल्प के बारे में साेच रहा है, वहीं साईबाबा ट्रस्ट का कहना है कि उनके पास जमा एफडी को तोड़ने के अलावा अन्य विकल्प नहीं है। पेश है दान के जरिए सबसे ज्यादा आय अर्जित करने वाले मंदिरों की रिपोर्ट....
साई बाबा ट्रस्ट, शिरडी, महाराष्ट्र
एफडी तोड़ 15 करोड़ रु. सैलरी बांटी, मिले सिर्फ ढाई करोड़ रु.:
शिरडी के साईबाबा मंदिर ट्रस्ट की सालाना आय करीब 700 करोड़ रुपए है। बीते दो महीने में करीब ढाई करोड़ रुपए ऑनलाइन डोनेशन मिला है जबकि दान पेटी में इस दौरान करीब 100 करोड़ रुपए का दान नहीं आया। मंदिर के 6 हजार कर्मचारियों को अप्रैल का वेतन देने के लिए एफडी तुड़वानी पड़ी। मंदिर के पास करीब 2500 करोड़ रुपए की एफडी है। लॉकडाउन खत्म होने पर दर्शनार्थियों की संख्या को एक तिहाई किया जाएगा ताकि सोशल डिस्टेंसिंग बरकरार रहे।

हमेशा भक्तों से भरा रहने वाला शिरडी का साई बाबा मंदिर लॉकडाउन के दौरान खाली पड़ा है।

तिरुपति बालाजी, आंध्रप्रदेश
एफडी-जमा सोने के इस्तेमाल के बजाय नए विकल्प ढूंढेंगे:रोज सबसे ज्यादा दान पाने वाले तिरुपति के वेंकटेश्वर बालाजी देवस्थानम को हर माह करीब 200 करोड़ रु. का नुकसान उठाना पड़ रहा है। पिछले दो माह में 400 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। मंदिर के करीब 22 हजार कर्मचारियों के वेतन, रख-रखाव व सुरक्षा पर 110 करोड़ रुपए महीने का खर्च आता है। समिति के अनुसार, मई का वेतन तो दे देंगे लेकिन, जून से नए स्रोत तलाशने होंगे, क्योंकि मंदिर के फिक्स डिपॉजिट व जमा सोने का इस्तेमाल परंपरा के विरुद्ध होगा।

माता वैष्णो देवी, कटरा, जम्मू
अब ऑनलाइन दान-प्रसाद के विकल्पों को आजमाना होगा:
कटरा स्थित माता वैष्णो देवी मंदिर में हर महीने 25-30 करोड़ रुपए दान आता है। लॉकडाउन से करीब 60 करोड़ रु. आवक घटी है। मंदिर के 3 हजार कर्मचारियों की सैलरी 13 करोड़ रुपए है। इसके अलावा रखरखाव, अन्य खर्चे भी 4-5 करोड़ रुपए हैं। श्राइनबोर्ड दो महीने से वेतन व खर्चों को जमा राशि में से दे रहा है, लेकिन अब नकदी न होने से मुश्किल आ सकती है। श्राइनबोर्ड की अन्य आवक भी घटी है, इसलिए ऑनलाइन दान-प्रसाद के विकल्प आजमाएंगे।

पद्मनाभस्वामी, तिरुवनंतपुरम, केरल
जमा रकम के ब्याज से वेतन, 6 करोड़ रुपए का नुकसान: केरल के तिरुवनंतपुरम का पद्मनाभस्वामी मंदिर देश में सबसे अधिक संपत्ति वाला मंदिर है। लाॅकडाउन से मंदिर को करीब 6 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। मंदिर को महीने औसतन 2.5 से 3 करोड़ रुपए की आय होती है। मंदिर के 307 कर्मचारियों को हर महीने 1.1 करोड़ रुपए वेतन के रूप में दिए जाते हैं। पिछले महीने बैंक में जमा राशि और इस महीने डिपाॅजिट पर मिलने वाले ब्याज से वेतन बांटा गया। ऑनलाइन दान में रोजाना करीब 25 हजार रुपए ही मिल रहे हैं।
सिद्धि विनायक, मुंबई, महाराष्ट्र
ऑनलाइन दान का विकल्प होने के बावजूद आवक घटी: मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर में बीते दो महीने में दान की आवक 90% तक घटी है। मंदिर की वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों व बीते सालों की बैलेंस शीट के हिसाब से मंदिर में करीब 150 कर्मचारी हैं, उनका वेतन व रख-रखाव सहित करीब 6-7 करोड़ रुपए का मासिक खर्च है। मंदिर की सालाना आय 410 करोड़ रुपए के करीब है। इस हिसाब से औसतन 21-22 लाख श्रद्धालु मंदिर नहीं आए और मंदिर को करीब 60-65 करोड़ रुपए का दान नहीं मिल सका।



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Padmanabh Temple, which got Rs 3 crore every month, is now earning only 25 thousand rupees, after tearing the Sai Trust FD and distributing salary


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हरफोन कॉल पर सरकार की तरफ से कोरोना को लेकर दी जा रही सुरक्षात्मक चेतावनी, ''कोरोना से दूर रहना, कोरोना मरीजों से नहीं'' इंदौर के लोगों के लिए सिर्फ सुनने के लिए रह गई है। मध्यप्रदेश के इंदौर में कोरोना संक्रमितों के साथसामाजिक बहिष्कार, तिरस्कार की सूचनाएं मिली हैं। कई ऐसे मामले सामने आए हैं कि इंदौरी होने पर शर्म आ जाए।

शहर में अबतक 2299 कोरोना के मरीज मिले हैं, हजारों में लक्षण और सैकड़ों लोगों को सतर्कता बरते हुए आइसोलेट कर दिया है। लेकिन, इस तरह की खबरों ने इंसानियतपर सवाल उठा दिए हैं। लोगों का कहना है कि उन्हें आतंकी जैसा समझा जाने लगा है। घर का रास्ता ब्लॉक कर दिया, दवा और किराने पर रोक लगा दी गई है।ऐसे में सामाजिक वैमनस्य रोकने के लिएदैनिक भास्कर लोगों से अपील करता है कि पॉजिटिव हैं, पराए नहीं; इन्हें दूर से संभालिए।

मुरलीधर नीमा: ऐसे देखने लगे जैसे कोई अपराध कर दिया हो

ये हैं मून पैलेस निवासी 55 वर्षीय व्यापारी मुरलीधर नीमा। कहते हैं- कोरोना हुआ तो लोगों को लगा जैसे मैंने अपराध कर दिया हो। मैं आतंकवादी हूं। सभी नहीं लेकिन, कुछ मुझे और परिवार को हीन भावना से देखने लगे। चाहते हैं हम लोग कॉलोनी छोड़कर चले जाएं।

सौरभ तिवारी: डिलीवरी बॉय दवा देने आया, वापस भेज दिया

ये हैं मधुबन कॉलोनी निवासी सौरभ तिवारी।

वह कहते हैं बुआ और पापा के कोरोना पॉजिटिव होते ही लोगों ने टेंट लगाकर हमारे घर आने के रास्ते बंद कर दिए। दूध, कचरा गाड़ी वाले को नहीं आने दिया। ऑनलाइन दवाई मंगवाई, पर डिलीवरी बॉय को आने नहीं दिया।

श्वेता सिंघल: किराना मंगाया तो देने से मना कर दिया

ये हैं मनीष बाग निवासी श्वेता सिंघल।

वह कहती हैं परिवार के तीन सदस्य पॉजिटिव निकले। किराना मंगाया तो डिलीवरी बॉय ने इनकार कर दिया। कहने लगा कि दूसरे ग्राहकों को पता लगा कि हमने मनीष बाग में डिलीवरी दी है तो सामान नहीं खरीदेंगे।

अंकित नीमा : बीमारी तो ठीक हो गई, सबकी सोच कैसे ठीक होगी

ये हैं अहिल्यापुरी निवासी अंकित नीमा।

वह कहते हैं कोरोना का इलाज कराने के बाद 6 मई को डिस्चार्ज हुआ। होम आइसोलेट हूं। पड़ोस में मेरे बारे में पता चलने के बाद लोगों के व्यवहार बदल गए। बीमारी का तो इलाज हो गया, लेकिन समाज की सोच कब ठीक होगी।

हर्षिता जोशी : किराना और फल- सब्जियां ही मिलना बंद हो गईं

ये हैं नेहरू नगर निवासी हर्षिता जोशी।

वह कहती हैं मैं कोरोना से तो ठीक हो गई, लेकिन अब कोई मदद करने को तैयार नहीं है। निगम की कचरा गाड़ी तक नहीं आ रही है। तीन बोरी कचरा जमा हो गया। किराना सामान, फल और सब्जियां कुछ नहीं मिल पा रहा है।

रवींद्र सिंह होरा : घर के दोनों रास्ते बंद कर दिए, चेहरा देखते ही मुंह फेरने लगे

ये हैं स्कीम 103 निवासी रवींद्र सिंह होरा।

वह कहते हैं इलाज के बाद 30 अप्रैल को छुट्टी हुई। घर के दोनों रास्ते पड़ोसियों ने बंद कर दिए। नजरें मिलती है तो चेहरा फेर लेते हैं। घर के सामने से निकलना बंद कर दिया।

(अगर आपके आसपास भी ऐसा कुछ घटा हो तो बताएं। मरीज को संबल देने के अच्छे उदाहरण भी बताइए-9406666652)



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मून पैलेस निवासी 55 वर्षीय व्यापारी मुरलीधर नीमा।


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देश में मरीज दोगुने होने की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार कोकहा कि पहले 12 दिन में मरीज दोगुने हो रहे थे। अब पिछले तीन दिन में यह दर 13.9 दिन रह गई है। बावजूद इसके आज भारत में कोरोना मरीजों की संख्या चीन के बराबर हो जाएगी। इतना ही नहीं दुनिया में भारत 11वां सबसे ज्यादा संक्रमित देश बन जाएगा।

मरीज

चीन में 40 दिन से 10 से कम नए मरीज मिल रहे। भारत में रोज 3 हजार से ज्यादा मरीज मिल रहे हैं। भारत शुक्रवार को चीन को पीछे छोड़ अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, इटली, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, ईरान के बाद 11वां सबसे प्रभावित देश बन जाएगा।

फैलाव

अहम बात यह कि चीन ने संक्रमण का फैलाव रोक दिया था। 72 हजार मरीज सिर्फ हुबेई प्रांत में थे। वुहान शहर इसका केंद्र था। इधर, भारत के 5 राज्यों में 5 हजार से ज्यादा मरीज हैं। महाराष्ट्र में 27 हजार से ज्यादा हैं।

एक्टिव केस

चीन में सक्रिय मरीजों की संख्या 14 अप्रैल को 1 हजार से नीचे पहुंच चुकी थी। इधर, भारत में 14 अप्रैल को सक्रिय मरीज 10 हजार हो चुके थे। यानी एक महीने में चीन में 9,894 एक्टिव मरीज कम हुए, जबकि भारत में 40 हजार से ज्यादा बढ़ गए।

मौतें

अहम बात यह कि भारत में मरीजों की मृत्यु दर दुनिया में रूस और पेरू के बाद सबसे कम है। अमेरिका में अभी मृत्युदर 5.96% है, जबकि, यूरोप में 9.22% बनी हुई है। दुनिया में मृत्युदर 6.70% बनी हुई है।

लॉकडाउन

  • चीन में 21 दिन बाद मरीज घटने लगे, भारत में 51 दिन बाद भी बढ़ रहे
  • चीन में 23 जनवरी को लॉकडाउन लगा था। उसके बाद 12 फरवरी को एक दिन में सबसे ज्यादा 14 हजार मरीज मिले थे। लेकिन, उसके बाद नए मरीजों की संख्या लगातार गिरने लगी। इसलिए 8 अप्रैल को 77 दिन बाद चीन में लॉकडाउन हटा दिया गया।
  • इधर, भारत में 25 मार्च को लॉकडाउन लगा। 51 दिन बाद भी मरीज घटने शुरू नहीं हुए हैं। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जून के आखिरी महीने में मरीज चरम पर हो सकते हैं। हालांकि, लॉकडाउन में धीरे-धीरे छूट बढ़ रही है।
  • विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन ने सख्त लॉकडाउन के दम पर वायरस को वुहान से बाहर नहीं निकलने दिया। चीन का 70% इलाका सुरक्षित बना रहा। लेकिन, भारत में सिर्फ पूर्वोत्तर राज्यों के तीन राज्यों के अलावा कोई भी इलाका वायरस से अछूता नहीं बचा है।


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यह फोटो गुजरात के अहमदाबाद की है। गुरुवार को यहां स्वास्थ्य कर्मचारी नई दिल्ली से स्पेशल ट्रेन के जरिए पहुंचने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग करते नजर आए।


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सामान्य बातचीत के दौरान भी सांसों के साथ निकलने वाली छोटी बूंदें (रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट) हवा में 8 मिनट और इससे भी ज्यादा लंबे समय तक रह सकती हैं। कोरोनावायरस फैलने की एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है। यह दावा अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिसीज और पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने स्टडी में किया है।

यह स्टडी प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुई है। इससे यह समझने में भी मदद मिली है कि अस्पतालों, घरों, आयोजनों और क्रूज जैसे सीमित हवा वाली जगहों पर संक्रमण ज्यादा क्यों फैला। यह स्टडी एक प्रयोग पर आधारित है, जिसमें इंसानों के बोलते समय मुंह से निकलने वाली ड्रॉपलेट पर लेजर लाइट का इस्तेमाल किया गया था। स्टडी में कहा गया है कि लेजर लाइट के ऑब्जर्वेशन से पता चला है कि जोर से बोलने पर हर सेकेंड हजारों फ्लूइड ड्रॉप्लेट निकल सकते हैं।

'द.कोरिया के कॉल सेंटर में कोरोना से काफी लोग संक्रमित हुए थे'
पिछली रिसर्च में पता चला था कि द. कोरिया के कॉल सेंटर में कोरोना से काफी लोग संक्रमित हुए थे। इसी तरह के हालात चीन के भीड़भाड़वाले रेस्तरां के भी थे। कुछ एक्सपर्ट्स को संदेह हुआ कि ऐसी जगहों और भीड़भाड़ वाले आयोजनों के कारण वायरस छोटे ड्रॉपलेट से फैल सकता है।

'ड्रॉपलेट में संक्रमण के फैलाव के पर्याप्त कण हो सकते हैं'
स्टडी में कोरोना या किसी अन्य वायरस को शामिल नहीं किया गया था, बल्कि यह देखा गया कि लोग बोलने पर कैसे ड्रॉपलेट पैदा करते हैं। शोधकर्ताओं का ध्यान छोटे ड्रॉपलेट पर था। इससे नतीजा निकाला गया कि इन ड्रॉपलेट में संक्रमण के फैलाव के पर्याप्त कण हो सकते हैं।

जो लोग मास्क नहीं पहनते, उनके संक्रमित होने की आशंका ज्यादा

शोधकर्ताओं का मानना है कि सीधे तौर पर तो यह नहीं कहा जा सकता कि ड्रॉपलेट के कारण ही कोरोनावायरस फैल रहा है। स्टडीमें कहा गया है कि इसी कारण जो लोग फेस मास्क नहीं पहनते, उनके संक्रमित होने की आशंका ज्यादा है, क्योंकि रेस्पिरेटरी ड्रॉपलेट के कारण कोरोना फैल सकता है, इस बात को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते।



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: Droplets released during normal conversation remain in the air for eight minutes, there is a possibility of corona spreading


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गोवा में एक बार फिर कोरोना ने दस्तक दे दी हैजबकि यह राज्य पहले कोरोना मुक्त घोषित हो चुका था। गोवा में बुधवार रात कोरोना के 7 नए मरीज मिले। इसके पहले यहां करीब 40 दिन पहले यानी 3 अप्रैल को कोरोना का आखिरी मरीज मिला था। पहले के सभी सात मरीजों के ठीक होने के बाद 17 अप्रैल को राज्य कोरोना मुक्त घोषित किया गया था। नए मरीजों में से 5 एक ही परिवार के हैं। लॉकडाउन में ढील के बाद ही यह परिवार महाराष्ट्र से गोवा लौटा था। इनके अलावा दो और पॉजिटिव मरीज ट्रक ड्राइवर हैं।

लॉकडाउन के बीच विदेश से आए करीब 6500 पर्यटक लौट चुके हैं। ये पयर्टक जर्मनी, इटली, पोलैंड, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और स्विट्जरलैंड के थे, जिन्हें इनके देशों ने विशेष फ्लाइट भेजकर वापस बुला लिया। अभी करीब एक हजार विदेशी सैलानी यहां फंसे हुए हैं।

लॉकडाउन की वजह से टूरिज्म इंडस्ट्री पूरी तरह से ठप है

इधर, नए कोविड नियमों के साथ गोवा के बाजार अब खुल चुके हैं। पणजी का बाजार पूरी तरह से खुला है, लेकिन राज्य की आर्थिक व्यवस्था को काफी धक्का लगा है। पटरी पर आने में गोवा को समय लगेगा। राज्य का आर्थिक आधार मुख्य तौर पर तीन इंड्स्ट्रीज पर हैं- टूरिज्म, माइनिंग और फार्मास्युटिकल। इसमें कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से टूरिज्म इंडस्ट्री पूरी तरह से ठप है।

ट्रेवल एंड टूरिज्म एसोसिएशन के वाइस प्रेसीडेंट जैक अजीत सुखीजा बताते हैं कि लॉकडाउन के चलते टूरिज्म इंडस्ट्री को तकरीबन 1200 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। तमाम होटल, गेस्ट हाउस और रेस्तरां बंद हैं। गोवा में 4,000 होटल और गेस्ट हाउस हैं जो एकदम खाली हैं। अभी बारिश का सीजन शुरू होने वाला है, इसलिए लॉकडाउन खुलने के बावजूद टूरिस्ट नहीं आएंगे।

गोवा में ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरर्स को बसें चलाने के लिए भी कह दिया गया है। हालांकि, यहां के बड़े ट्रांसपोर्टर दामोदर मांदरेकर कहते हैं- मेेरे पास 14 बसें हैं। परमिशन मिल चुकी है, लेकिन खाली बस लेकर जाऊं कहां, क्योंकि टूरिस्ट तो है ही नहीं। पहले मेरे पास बड़े-बड़े ग्रुप भोपाल, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ से आते रहे हैं। इधर, राज्य में टैक्सी सेवा भी शुरू हो चुकी हैं।

नॉर्थ गोवा के बीचफिलहाल खाली हैं

गोवा में छोटे-बड़े कुल 48 बीच हैं। नॉर्थ गोवा के बीच बाघा, अंजुना, कलंगुट आदि पर ज्यादा भीड़ आम दिनों में रहती है, लेकिन फिलहाल ये खाली हैं। यहां स्पोर्टस गतिविधियां थमी हुई हैं। साउथ गोवा महंगा है।वहां ज्यादातर विदेशी सैलानी या पैसे वाले लोग जाते हैं। हर बीच पर करीब 100 रिटेल दुकानें हैं, जो फिलहाल बंद हैं। गोवा में काजू, रस बेरी, नारियल, लोकल वाइन की बिक्री भी टूरिस्टों की वजह से ज्यादा होती है, जो फिलहाल बंद हैं।

जैक अजीत सुखीजा का कहना है कि वे सरकार पर टूरिज्म शुरू करने को लेकर दबाव इसलिए नहीं बना सकते, क्योंकि अगर कोई सैलानी रेड जोन से यहां आता है तो गोवा फिर से दिक्कत में आ जाएगा। बता दें कि गोवा में एक साल में 3 लाख विदेशी, 17 लाख भारतीय सैलानी पहुंचते हैं।

गोवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष संकल्प अमोनकर कहते हैं- माइनिंग के अलावा गोवा के पास आर्थिक हालत ठीक करने का फिलहाल कोई रास्ता नजर नहीं रहा है। दिल्ली से गोवा के लिए ट्रेन शुरू की गई है। इससे गोवा में फिर कोरोना के केस आ सकते हैं। गोवा भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना का कहना है कि कोरोना के लिए गोवा में भी वही नियम लागू थे, जो बाकी देश के लिए थे। गोवा की जनता ने सख्ती से लॉकडाउन का पालन किया।

रेंडम टेस्ट और विदेशी पर्यटकों को ट्रेस कर कोरोना को फैलने से रोका
गोवा कोरोना के खिलाफ ठोस कदम उठाने वाले शुरुआती राज्यों में से एक है। लॉकडाउन, रैंडम सैंपलिंग, जागरूकता अभियान और लगातार ट्रैकिंग ने अहम भूमिका निभाई। गोवा ने राज्य में ही टेस्टिंग के लिए लैब स्थापित की। विदेश से आए पर्यटकों को ट्रेस किया। शुरुआती 7 में से 6 संक्रमित मुंबई से एक शिप से आए थे। ये लोग जहां भी गए थे, उन स्थानों पर रैंडम सैंपलिंग की गई।

रैंडम सैंपलिंग करने वाला गोवा पहला राज्य बना। गोवा कर्नाटक, महाराष्ट्र और केरल जैसे हॉटस्पॉट से घिरा हुआ है। ऐसे में सीमाई इलाकों और औद्योगिक इलाकों में कियोस्क स्थापित किए गए, जहां से सैंपल लेना आसान हो गया। डोर से डोर सर्वे किया और संदिग्ध मिले करीब 5 हजार लोगों का सैंपल लिया। जब कोरोना शुरू हुआ था तब राज्य में 100 वेंटिलेंटर का सेटअप था। इसे बढ़ाकर 400 कर दिया गया।



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तस्वीर गोवा की राजधानी पणजी के मीरामार बीच की है। यह पणजी के दो प्रमुख समुद्र तटों में से एक है। लॉकडाउन के ढील के बावजूद यह सूना पड़ा है। सामान्य दिनों में यहां भीड़ रहती है।


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देश में मरीज दोगुने होने की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार कोकहा कि पहले 12 दिन में मरीज दोगुने हो रहे थे। अब पिछले तीन दिन में यह दर 13.9 दिन रह गई है। बावजूद इसके आज भारत में कोरोना मरीजों की संख्या चीन के बराबर हो जाएगी। इतना ही नहीं दुनिया में भारत 11वां सबसे ज्यादा संक्रमित देश बन जाएगा।

मरीज

चीन में 40 दिन से 10 से कम नए मरीज मिल रहे। भारत में रोज 3 हजार से ज्यादा मरीज मिल रहे हैं। भारत शुक्रवार को चीन को पीछे छोड़ अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, इटली, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, ईरान के बाद 11वां सबसे प्रभावित देश बन जाएगा।

फैलाव

अहम बात यह कि चीन ने संक्रमण का फैलाव रोक दिया था। 72 हजार मरीज सिर्फ हुबेई प्रांत में थे। वुहान शहर इसका केंद्र था। इधर, भारत के 5 राज्यों में 5 हजार से ज्यादा मरीज हैं। महाराष्ट्र में 27 हजार से ज्यादा हैं।

एक्टिव केस

चीन में सक्रिय मरीजों की संख्या 14 अप्रैल को 1 हजार से नीचे पहुंच चुकी थी। इधर, भारत में 14 अप्रैल को सक्रिय मरीज 10 हजार हो चुके थे। यानी एक महीने में चीन में 9,894 एक्टिव मरीज कम हुए, जबकि भारत में 40 हजार से ज्यादा बढ़ गए।

मौतें

अहम बात यह कि भारत में मरीजों की मृत्यु दर दुनिया में रूस और पेरू के बाद सबसे कम है। अमेरिका में अभी मृत्युदर 5.96% है, जबकि, यूरोप में 9.22% बनी हुई है। दुनिया में मृत्युदर 6.70% बनी हुई है।

लॉकडाउन

  • चीन में 21 दिन बाद मरीज घटने लगे, भारत में 51 दिन बाद भी बढ़ रहे
  • चीन में 23 जनवरी को लॉकडाउन लगा था। उसके बाद 12 फरवरी को एक दिन में सबसे ज्यादा 14 हजार मरीज मिले थे। लेकिन, उसके बाद नए मरीजों की संख्या लगातार गिरने लगी। इसलिए 8 अप्रैल को 77 दिन बाद चीन में लॉकडाउन हटा दिया गया।
  • इधर, भारत में 25 मार्च को लॉकडाउन लगा। 51 दिन बाद भी मरीज घटने शुरू नहीं हुए हैं। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जून के आखिरी महीने में मरीज चरम पर हो सकते हैं। हालांकि, लॉकडाउन में धीरे-धीरे छूट बढ़ रही है।
  • विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन ने सख्त लॉकडाउन के दम पर वायरस को वुहान से बाहर नहीं निकलने दिया। चीन का 70% इलाका सुरक्षित बना रहा। लेकिन, भारत में सिर्फ पूर्वोत्तर राज्यों के तीन राज्यों के अलावा कोई भी इलाका वायरस से अछूता नहीं बचा है।


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यह फोटो गुजरात के अहमदाबाद की है। गुरुवार को यहां स्वास्थ्य कर्मचारी नई दिल्ली से स्पेशल ट्रेन के जरिए पहुंचने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग करते नजर आए।


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कोरोना संक्रमण की रफ्तार देश में किस तरह से बढ़ रही है, इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि 30 अप्रैल को देश में कोरोना के 33 हजार 610 केस थे और 13 मई को इनकी संख्या बढ़कर 74 हजार 281 हो गई। यानी, इन 13 दिनों में देश में कोरोना के 120% मरीज बढ़ गए।

तारीख 30 अप्रैल इसलिए, क्योंकि इसी दिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना संक्रमितों की संख्या के आधार पर देश के सभी जिलों को रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन में बांटा था। इस लिस्ट में 733 जिलों में से 130 जिलों को रेड, 284 को ऑरेंज और 319 जिलों को ग्रीन जोन में रखा था।

रेड जोन वो जिले बने, जहां कोरोना के सबसे ज्यादा मामले आए। ऑरेंज जोन में ऐसे जिलों को रखा गया, जहां 14 दिन से कोई नया मरीज नहीं मिला था। जबकि, ग्रीन जोन में उन जिलों को शामिल किया गया जहां या तो कोरोना कोई मरीज मिला ही नहीं था या वहां 21 दिन से कोई नया मामला नहीं आया था।

सरकार ने भी रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन के जिलों को लॉकडाउन-3 में कुछ रियायतें दीं। ग्रीन जिलों को रेड और ऑरेंज के मुकाबले थोड़ी ज्यादा छूट मिली। शायद यही वजह रही कि 30 अप्रैल तक जो जिले ग्रीन जोन में थे, वहां अब कोरोना मरीज भी मिल गए हैं।

हमने कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित 20 राज्यों के ग्रीन जोन जिलों का एनालिसिस किया। 30 अप्रैल को सरकार ने इन 20 राज्यों के 162 जिलों को ग्रीन जोन में रखा था। लेकिन, 13 मई तक इन 162 जिलों में से 102 जिलों में कोरोना के मामले सामने आ गए और 14 मौतें भी हुई हैं। इसका मतलब ये हुआ कि अब इन 20 राज्यों में सिर्फ 60 जिले ही ग्रीन जोन में रह गए हैं।

ओडिशा का गंजम जिला, यहां 13 दिन में 252 केस आए

ओडिशा का गंजम जिला 30 अप्रैल तक ग्रीन जोन में था। 2 मई तक यहां सिर्फ 2 केस ही थे। लेकिन, 13 मई तक यहां 252 केस आ चुके हैं। किसी भी ग्रीन जोन जिले में इतने ज्यादा मामले सामने आने वाला गंजम पहला जिला है। अच्छी बात ये है कि यहां मौत नहीं हुई है।

गंजम के बाद त्रिपुरा का धलाई जिला है, जहां 151 मामले आए हैं। धलाई में भी 30 अप्रैल तक कोरोना का एक भी मरीज नहीं मिला था। इतना ही नहीं, त्रिपुरा में सिर्फ तीन ही केस थे, जो 13 मई तक बढ़कर 155 हो गए हैं।

ग्रीन जोन में भी मामले बढ़ने की 2 बड़ी वजह
1) पहली : प्रवासी मजदूरों का लौटना

1 मई से रेलवे प्रवासी मजदूरों के लिए स्पेशल श्रमिक ट्रेनें चला रही है। 14 मई तक 800 स्पेशल ट्रेनें चल चुकी हैं, जिनसे 10 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजा गया है। ओडिशा में 12 मई को 23 नए केस आए थे और वहां के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, ये सभी वो लोग थे, जो दूसरे राज्यों से लौटकर आए थे।महाराष्ट्र में गढ़चिरौली एकमात्र ऐसा जिला है, जहां अब तक कोरोना का एक भी मरीज नहीं मिला है। यहां के कलेक्टर दीपक सिंगला ने पीटीआई को बताया था कि जिन दूसरे जिलों में अचानक से मामले बढ़ रहे हैं, वो दूसरे राज्यों से लोगों के आने की वजह से बढ़े हैं।

दूसरी : पाबंदियों में ढील देना
1 मई को जब लॉकडाउन-3 के लिए नई गाइडलाइन जारी हुई, तो उसमें ग्रीन जोन जिलों को रेड और ऑरेंज के मुकाबले ज्यादा ढील दी गई। यहां 4 मई से स्पा-सैलून भी खोलने की इजाजत दी गई। 50% यात्रियों के साथ बसों को भी चलने की इजाजत दे दी। टैक्सी सर्विस भी शुरू कर दी। शराब, पान और तंबाकू की दुकानें भी यहां 4 मई से खुलने लगीं।

(इस स्टोरी में राज्यों के आंकड़े उनके स्वास्थ्य विभाग की तरफ से जारी होने वाले मीडिया बुलेटिन से लिए गए हैं)



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As of April 30, 162 districts were in the Green Zone in 20 states most affected by Corona, but 102 of these districts got infected in the last 13 days.


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रात के 11 बजे हैं। दिल्ली का कालकाजी इलाका सन्नाटे में डूबने लगा है। सड़कें खाली हो चुकी हैं और गलियां सुनसान। कुछ देर पहले तक जो इकलौता ढाबा यहां खुला था, उस पर भी अब ताला लटक गया है। एक अंधेरी गली में सिगरेट पीते तीन लड़के पुलिस की गाड़ी का सायरन सुनते ही अलग-अलग दिशाओं में ओझल हो गए।

चौतरफा फैले सन्नाटे को अपने सायरन से तोड़ती दिल्ली पुलिस की यह गाड़ी ईआरवी कहलाती है। ईआरवी यानी ‘इमर्जेन्सी रेस्पॉन्स व्हीकल।’ ये दिल्ली पुलिस की सबसे मुस्तैद सेवाओं में गिनी जाती है। कोई भी घटना या अपराध होने पर दिल्ली पुलिस की जो टीम सबसे पहले मौके पर पहुंचती है और आधिकारिक कार्रवाई की शुरुआत करती है, वह ईआरवी ही होती है। इनमें हर वक्त ड्राइवर के अलावा एक एएसआई यानी सहायक उपनिरीक्षक और एक कॉन्स्टेबल मौजूद होते हैं।

गाड़ी में तीन सुरक्षा कवच, तीन हेलेमट, दो लाठी, एक वायरलेस सेट, एक माइक और करीब तीस मीटर लंबी एक मोटी-सी रस्सी भी रखी होती है। यह रस्सी इसलिए कि आपात स्थिति में अगर किसी इलाके की घेराबंदी करके उसे सील करना हो तो बाकी संसाधनों के पहुंचने तक इस रस्सी से यह काम किया जा सके। इसके अलावा ईआरवी में तैनात एएसआई के पास अपनी सर्विस पिस्टल और कॉन्स्टेबल के पास तीस राउंड वाली एमपी-5 सब मशीन गन भी रहती हैं।

आपात स्थिति में सबसे पहले प्रतिक्रिया देने के साथ ही लगातार इलाके में गश्त करते रहना भी ईआरवी का मुख्य काम है।सुबह के आठ बजे से रात के आठ बजे तक एक टीम यह जिम्मेदारी निभाती है और रात के आठ बजने पर दूसरी टीम आकर यह मोर्चा अगली सुबह तक के लिए संभाल लेती है।

दिल्ली के हर थाना क्षेत्र में एक या दो ईआरवी होती हैं जो चौबीसों घंटे इलाके में गश्त करती हैं।

कालकाजी इलाके में घूम रही इस ईआरवी में आज एएसआई प्रकाश तंवर अपनी टीम के साथ मौजूद हैं। यह गाड़ी एल्लार बीजू चला रहे हैं जो मूलतः केरल के रहने वाले हैं और पीछे बंदूक लिए कॉन्स्टेबल रमेश मालिक बैठे हैं जो करीब 18 साल फौज में नौकरी करने के बाद दिल्ली पुलिस में शामिल हुए हैं।बीते तीन घंटों में इन लोगों ने अपने थाना क्षेत्र के लगभग चप्पे-चप्पे में गश्त का एक राउंड पूरा कर लिया है।

एएसआई प्रकाश तंवर बताते हैं कि लॉकडाउन के चलते इन दिनों पूरा इलाका सील किया गया है। ऐसे में सिर्फ तीन रास्ते हैं जहां से कोई भी व्यक्ति कालकाजी थाना क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है और इन तीनों जगहों पर उनकी पिकेट (बैरिकेट) लगी हुई हैं जहां उनके साथी तैनात हैं। ऐसी ही एक पिकेट पर पुलिस वाले आती-जाती हर गाड़ी की जांच कर रहे हैं। गाड़ियों में बैठे लोगों के पहचान पत्र और मूवमेंट पास जांचने के लिए उनके पास एक विशेष यंत्र है जिसे आईआईटी के छात्रों ने बनाया है।

किसी सेल्फी-स्टिक जैसे इस यंत्र में एक मैग्निफाइंग लेंस लगा है। इसी के जरिए पुलिसकर्मी सुरक्षित दूरी से ही लोगों के पहचान पत्रों की जांच करते हैं।

सड़क पर तैनात दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों को जरूरत का हर सामान उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी इन दिनों ईआरवी को सौंपी गई है। लिहाजा प्रकाश तंवर जब अपनी ईआरवी के साथ पारस चौक पहुंचते हैं तो यहां तैनात सिपाहियों को गाड़ी से कुछ कोल्ड ड्रिंक्स निकाल कर देने के बाद ही आगे बढ़ते हैं।

लगभग पूरे थाना क्षेत्र में गश्त का एक चक्कर पूरा करने के बाद गाड़ी कुछ देर सुस्ताने के लिए ठहरी है। प्रकाश तंवर अपने साथियों से चर्चा कर रहे हैं कि उन्हें दिल्ली पुलिस में नौकरी करते हुए 35 साल हो चुके हैं लेकिन आज से पहले उन्होंने ऐसा माहौल कभी नहीं देखा। उन्होंने दिल्ली को मंडल आंदोलन के दौरान जलते देखा है, बम धमाकों से उजड़ते देखा है और दंगों में टूटते भी देखा है लेकिन इस कदर सहमे हुए और खामोश कभी नहीं देखा जैसा वो इन दिनों देख रहे हैं।

इन बातों में अपना अनुभव शामिल करते हुए कॉन्स्टेबल रमेश कहते हैं, ‘मैंने 18 साल से ऊपर फौज में नौकरी की। इस दौरान कश्मीर तक में तैनात रहा और कई बार आतंकवादियों से आमने-सामने की मुठभेड़ भी हुई। लेकिन वहां हमें दुश्मन सामने दिखाई तो पड़ता था। इस महामारी में तो दुश्मन दिखता ही नहीं और ये पता तक नहीं चलता कि कौन उसका शिकार हो गया है।’

दिल्ली पुलिस के सौ से ज्यादा जवान अब तक कोरोना से संक्रमित पाए जा चुके हैं और एक जवान की तो मौत भी हो चुकी है। लेकिन विभाग के तमाम लोग पूरी मुस्तैदी से जिम्मेदारी निभा रहे हैं। प्रकाश और उनके साथीबताते हैं कि विभाग की ओर से भी इन दिनों उन्हें जैसा सहयोग और सुविधाएं मिल रही हैं, वह गजब है। न सिर्फ संक्रमण से बचने के लिए जरूरी चीजें बल्कि कई तरह के इम्यूनिटी बूस्टर भी विभाग इन लोगों को दे रहा है।

लॉकडाउन के चलते इन दिनों दिल्ली में अपराध से लेकर सड़क दुर्घटनाएं तक काफी कम हुई हैं। ऐसे में दिल्ली पुलिस का काम भी काफी कम हुआ है लेकिन दूसरी तरफ लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाना और प्रवासी मजदूरों को रोकना इन लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

रात के ठीक पौने 12 बजे हैं ईआरवी में लगा वायरलेस सेट पहली बार बजता है। सामने से बताया जाता है कि, ‘कालकाजी मंदिर में राम प्याऊ के पास करीब बीस लड़के रोके गए हैं जो सभी प्रवासी मजदूर हैं और बिहार के लिए पैदल निकले हैं।’ सूचना मिलते ही ईआरवी उस दिशा में बढ़ गई है। जो गाड़ी अब तक गश्त करते हुए 30-40 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से तेज नहीं चली थी, अब करीब 90 किलोमीटर/घंटा की रफ्तार से दौड़ने लगती है।

पुलिस को निर्देश हैं कि मजदूरों को किसी भी हाल में पैदल नहीं जाने दिया जाए। यही कारण है कि बीस से ज्यादा मजदूरों के पैदल जाने की खबर सुनते ही प्रकाश तंवर और उनकी टीम बेहद तेजी से उन लोगों को रोकने के लिए कालकाजी मंदिर की तरफ बढ़ गई है।

मौके पर पहुंचते ही ईआरवी टीम के इन सदस्यों ने सभी मजदूरों को उचित दूरी पर बैठा दिया है और इनसे पूछताछ करना शुरू किया है। ये सभी लोग अशोका बिंदुसार कैम्प की झुग्गियों से आए हैं और बिहार के कटिहार जाना चाहते हैं। पूछने पर ये मजदूर बताते हैं कि इन्हें दो वक्त का खाना भी अब नसीब नहीं हो रहा और झुग्गी मालिक किराए के लिए भी परेशान कर रहा है लिहाजा पैदल ही अपने घर-गांव लौटने को अब ये मजबूर हैं।

लेकिन इन्हें पैदल जाने की अनुमति देना प्रकाश तंवर और उनके साथियों के लिए मुमकिन नहीं है। वे इन लोगों को समझाते हैं, कहते हैं वापसी के लिए कुछ समय इंतजार करना होगा। कालकाजी थाने के इन्स्पेक्टर संदीप घाई भी मौके पर पहुंच चुके हैं और इन मजदूरों को किसी शेल्टर होम में भेजने के लिए एक बस बुलवा ली और इस तरह से बिहार के लिए पैदल निकले इन लोगों का सफर एक सराय में पहुंच कर खत्म हो गया है।

कोराना महामारी के पहले जामिया यूनिवर्सिटी, जेएनयू और दिल्ली में हुई हिंसा में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर कई सवाल उठे थे।

इन प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाने की प्रक्रिया निपटाते हुए रात के करीब दो बज चुके हैं। इन्स्पेक्टर वापस लौट चुके हैं और ईआरवी एक बार फिर सड़कों पर गश्त करने लगी है। उन्हें यह काम पूरी रात करना है और लगातार करना है।

कई बार ऐसा भी होता है दिल्ली की सड़कों पर ईआरवी में पुलिस वाले सोते हुए दिखाई देते हैं। इस बारे में प्रकाश कहते हैं, ‘इन दिनों अदालतें और अन्य सभी विभाग बंद हैं तो हमारा काम आसान है। वरना कई बार तो ऐसा होता है कि हम सुबह आठ बजे ड्यूटी से वापस लौटते हैं और सुबह दस बजे कोर्ट जाना होता है। कभी किसी मुजरिम को लेकर तो कभी गवाही पर। कई बार कोर्ट में शाम के चार-पांच तक बज जाते हैं और फिर आठ बजे दोबारा ड्यूटी होती है। ऐसे में अगर कोई पुलिस वाला झपकी लेता दिखे तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। वो भी आखिर इंसान ही है।’

सुबह पांच बजने पर प्रकाश और उनकी टीम की ड्यूटी का अंतिम पड़ाव करीब आने लगता है। इस वक्त स्थानीय लोग सैर के लिए निकलते हैं तो ईआरवी की जिम्मेदारी होती है कि पार्क और मैदानों में घूमने आ रहे लोगों की सुरक्षा में कोई सेंध न हो। ऐसे में यही टीम सभी पार्कों की सुरक्षा व्यवस्था भी जांचती है।

आठ बजे तक आम नागरिकों की दिनचर्या जब पटरी पर आती है, तब ईआरवी की यह टीम इलाके की सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा अपनी दूसरी टीम के हवाले कर वापस लौटती है। इन दिनों तो इन लोगों को वापस अपने घर लौटना भी नसीब नहीं है क्योंकि इससे इनके परिवार को भी संक्रमण का खतरा हो सकता है। लिहाजा इन दिनों पुलिस के सैकड़ों जवान या तो बैरक में रह रहे हैं या अपने थाना क्षेत्र के किसी होटल में ये रात गुजार रहे हैं ताकि अगली सुबह एक बार इस महामारी से लड़ने के लिए तैनात हो सकें।



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दिल्ली पुलिस को निर्देश हैं कि मजदूरों को किसी भी हाल में पैदल नहीं जाने दिया जाए। जब बीस से ज्यादा मजदूरों के पैदल बिहार के लिए निकलने की खबर ईआरवी टीम को मिली, तो इन्होंने फौरन वहां पहुंचकर मजदूरों से पूछताछ की और फिर इन्हें बस से दिल्ली के ही एक शेल्टर होम में भिजवा दिया।


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‘मम्मा आप डॉक्टर भी नहीं हो, पुलिस भी नहीं हो फिर आप रोज ऑफिस क्यों जाती हो?

पुणे की म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में एडिशनल कमिशनर और पीएमसी के हेल्थ डिपार्टमेंट की मुखिया आईएएस रूबल अग्रवाल से यह सवाल पूछने वाला उनका सात साल का बेटा है।
बेटे ने जब देखा कि पापा घर से काम करते हैं और उसके दोस्तों के पैरेंट्स भी घर पर ही रहते हैं तो उसे लगा आखिर मम्मी क्यों रोज ऑफिस जाती हैं?

रूबल का बेटा अभी सात साल का है। इन दिनों अपनी मां के लिए सरप्राइज गिफ्ट तैयार करते रहता है।

देश में कोरोना के बड़े हॉट स्पॉट में से एक पुणे है। शहर में अब तक 3000 से ज्यादा कोरोना पॉजिटिव मिल चुके हैं जबकि 168 की मौत हो गई है। रूबल कहती हैं ऐसे में जब घर से बाहर निकलने में भी लोग डर रहे हैं तब अपने सात साल के बेटे को छोड़कर जाना सचमुच मुश्किल होता है।जब ऑफिस से लौटती हूं तो बेटे को गले लगाने में भी डर लगता है।

बेटा अपने पापा के साथ मिलकर कुकिंग करता है और मम्मा के लिए दोनों कुछ स्पेशल बनाते हैं।

उनके पति प्रखर अग्रवाल इंफोसिस में नौकरी करते हैं और इन दिनों वर्क फ्रॉम होम मोड में हैं। बेटे को संभालने की जिम्मेदारी भी प्रखर पर ही है।
वह कहते हैं, जिस दिन पुणे में कोरोनावायरस के मामले सौ से ज्यादा हो गए थे, उस दिन रूबल इतनी ज्यादा गुमसुम हो गईं थी कि घर में किसी से बात ही नहीं कर रहीं थीं। बहुत ज्यादा तनाव में थीं।

रूबल के हसबैंड प्रखर आईटी कंपनी इंफोसिस में जॉब करते हैं।

रूबल राजस्थान के टोंक जिले के छोटे से गांव की रहने वाली हैं। जब वे पैदा हुईं थीं तो खुशियां इसलिए नहीं मनाईं गईं थी कि दूसरी भी लड़की हुई। काफी संघर्ष के बाद वह यह मुकाम हासिल कर पाई हैं।घरवाले नहीं चाहते थे कि वह ज्यादा पढ़े लिखें। बड़ी मिन्नतें करने पर उन्हें आईएएस की तैयारी करने को डेढ़ साल का वक्त दिया गया था।
वो भी उनकी भाभी और मां के सपोर्ट के चलते। इसी डेढ़ साल की मेहनत में रूबल ने एग्जाम पास किया। वरना घरवालों ने शर्त रखी थी कि एग्जाम क्लीयर नहीं किया तो शादी कर देंगे।

मजह डेढ़ साल की तैयारी में रूबल अग्रवाल ने एग्जाम क्लीयर कर दिया था।

प्रखर कहते हैं, ‘हमारी शादी 2009 में हुई थी, लेकिन नौकरी के चलते बीते दस सालों में हम लोग कभी एक साथ नहीं रह पाए।पिछले साल ही रूबल की पोस्टिंग पुणे हुई है और हमें एक छत के नीचे रहने का मौका मिला है।’
रूबल और प्रखर की पहली मुलाकात भी पुणे में हुई थी। रूबल की बुआ प्रखर के भाई की पड़ोसी थीं। रूबल आईएएस एग्जाम के बाद छुटि्टयों में वहां आई थी। बस तभीमुलाकात हुई जो धीरे-धीरे शादी तक पहुंच गई।

अपनी फैमिली के साथ रूबल।

इन दिनों जब तनाव से भरे दिन के बाद रूबल घर लौटती हैं तो पति और बेटा उनके लिए रोज कोई सरप्राइज तैयार रखते हैं।प्रखर कहते हैं वाइफ का दिन चुनौतियों के बीच गुजरता है, ऐसे में हम दोनों कोशिश करते हैं कि उसे कोई स्ट्रेस न हो।यूं तो रूबल हार नहीं मानती लेकिन जब दुखी होतीहैं तो हम दोनों प्लान बनाकर उन्हें खुश करने की कोशिश करते हैं।

मदर्स डे पर बेटे ने रूबल के लिए एक ग्रीटिंग कार्ड बनाया। रूबल ने कार्ड देखा तो इमोशनल हो गई और बेटे को गले लगा लिया।

मम्मा को खुश करने के लिए यह कार्ड बेटे ने बनाया था।

रूबल को खुश करने प्रखर अपने बेटे के साथ मिलकर कुकिंग करते हैं। हर दिन एक नई डिश बनाते हैं। प्रखर कहते हैं, पत्नी को इटैलियन, मैक्सिकन और राजस्थानी फूड पसंद है। इसलिए हर रोज डिनर हम उन्हीं की पसंद का बनाते हैं।

इन दिनों रूबल के लिए उनके हसबैंड हर रोज कुछ न कुछ स्पेशल बना रहे हैं।

रूबल के मुताबिक, यह उनकी लाइफ का सबसे चैलेंजिंग टास्क है। पिछले साल जब जलगांव में बाढ़ आई थी, तबवह जिले की कलेक्टर थीं। उस दौरान भी परिस्थितियां मुश्किल थीं, लेकिन कोरोना जैसे हालात तो कभी नहीं देखे।



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Son of Pune's IAS Rubal Agarwal asks- 'Mama, you are neither a doctor nor why do the police go to office every day'?


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'Mitron' app kya hai/what is 'mitron' app

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