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Wednesday, December 30, 2020
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Tuesday, December 29, 2020
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मेरठ के रहने वाले अमित त्यागी ने MBA किया है। कई साल तक उन्होंने मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी सैलरी पर काम किया। लेकिन, पत्नी की सलाह पर अपना जमा-जमाया काम छोड़कर गांव लौटने का फैसला किया। 20 साल पहले उन्होंने एक किलो केंचुए के साथ वर्मीकंपोस्ट बनाना शुरू किया था। आज उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उड़ीसा, असम समेत 14 राज्यों में उनकी करीब आठ हजार यूनिट हैं। इससे वे सालाना एक करोड़ रुपए कमा रहे हैं।
49 साल के अमित कहते हैं, "मेरी पत्नी ने भी MBA किया है। उन्हें एक कार्यक्रम में वर्मीकंपोस्ट तैयार करने की जानकारी मिली थी। उसके बाद उन्होंने कुछ ऐसा ही काम शुरू करने पर जोर दिया। फिर हमने तय किया कि कोशिश करके देखते हैं। काम शुरू करने के बाद हमने पहला सैंपल एक नर्सरी वाले को बेचा। करीब हफ्तेभर बाद नर्सरी वाला फिर से खाद की डिमांड करने लगा। खाद तैयार नहीं थी, तो हमने बहाना बनाया और कह दिया कि खाद 10 रुपए प्रति किलो है। हालांकि उस समय खाद की कीमत महज 50 पैसे प्रति किलो थी। नर्सरी वाला उसे 10 रुपए किलो में खरीदने के लिए तैयार हो गया।"
अमित बताते हैं कि इससे हमारा मनोबल बढ़ा और लगा कि इस कारोबार को आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन, ये सफर आसान नहीं था। तब बहुत कम लोग ऑर्गेनिक खेती करते थे। ज्यादातर लोग तो इसके बारे में जानते तक नहीं थे। ऐसी स्थिति में केमिकल फर्टिलाइजर की जगह वर्मीकंपोस्ट खरीदने के लिए लोगों को समझाना मुश्किल टास्क था। फिर उन्होंने अपनी मार्केटिंग स्किल्स का इस्तेमाल शुरू किया।
अमित ने गांवों का दौरा करना शुरू किया। वे हर दिन किसी न किसी गांव में जाते और चौपाल लगाकर लोगों को वर्मीकंपोस्ट के बारे में बताते थे। इस तरह धीरे-धीरे लोग उनसे जुड़ते गए। अब वे देशभर में अपना खाद सप्लाई कर रहे हैं। कई लोगों ने तो एडवांस बुकिंग कर ली है। उन्होंने मेरठ में ही 300 से ज्यादा वर्मीकंपोस्ट बेड लगाए हैं। हर महीने वे 100 टन से ज्यादा खाद तैयार करते हैं।
वर्मीकंपोस्ट कैसे तैयार की जाती है
अमित बताते हैं कि वर्मीकंपोस्ट तैयार करने के कई तरीके हैं। लोग अपनी सुविधा के मुताबिक कोई भी तरीका अपना सकते हैं। सबसे आसान तरीका है बेड सिस्टम। इसमें तीन से चार फीट चौड़ा और जरूरत के हिसाब से लंबा बेड बनाया जाता है। इसके लिए जमीन पर प्लास्टिक डाल दी जाती है। फिर उसके चारों तरह ईंट से बाउंड्री दी जाती है। बीच में गोबर डालकर उसे अच्छी तरह से फैला दिया जाता है। उसके बाद केंचुआ डालकर ऊपर से पुआल या घासफूस डालकर ढंक दिया जाता है। फिर इसके ऊपर नियमित रूप से पानी का छिड़काव किया जाता है।
बेड की लंबाई कितनी हो, गोबर और केंचुआ का अनुपात क्या हो, इसको लेकर वे कहते हैं कि किसान अपनी जरूरत के हिसाब से बेड की लंबाई रख सकता है। लेकिन उसे ध्यान रखना होगा कि उसी अनुपात में उसके पास मटेरियल भी होना चाहिए। अमूमन एक फिट लंबे बेड के लिए 50 किलो गोबर की जरूरत होती है। अगर हम 30 फीट लंबा बेड बना रहे हैं तो हमें 1500 किलो गोबर और 30 किलो केंचुआ चाहिए।
अगर किसी किसान के पास गोबर की उपलब्धता कम है, तो वह 30 फीसदी गोबर और बाकी घासफूस या ऐसी कोई भी चीज मिला सकता है जो आसानी से सड़ सके। एक फुट के बेड के लिए एक किलो केंचुए की जरूरत होती है। अगर केंचुआ कम होगा, तो खाद तैयार होने में वक्त ज्यादा लगेगा। पर्याप्त तौर पर सभी चीजें मिलाने के बाद 30 फीट लंबे बेड से खाद बनने में एक महीने का वक्त लगता है।
अमित कहते हैं कि केंचुए की कई प्रजातियां होती हैं। मैं जो यूज करता हूं, वो है आस्ट्रेलियाई आइसोनिया फेटिडा। यह एक दिन में एक किलो गोबर खाता है और वह डबल भी हो जाता है। यानी जो लोग खाद के साथ केंचुए का बिजनेस करना चाहते हैं, उनके लिए यह बेहतर विकल्प है।
इसके लिए क्या- क्या चीजें जरूरी हैं?
अमित के मुताबिक, इसके लिए सबसे जरूरी चीज जमीन और उसकी लोकेशन है। जमीन ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां पानी उपलब्ध हो और वहां आने-जाने के लिए रास्ता हो। ये भी ध्यान रखना जरूरी है कि वहां जलजमाव न होता हो। इसके बाद लंबी प्लास्टिक शीट, गोबर, पुआल और केंचुए की जरूरत होती है।
अमित देशभर में सजग इंटरनेशनल ब्रांड के नाम से केंचुआ खाद बेचते हैं। नर्सरी, घरेलू बागवानी, खेत और पॉली हाउस में इनके खाद की सप्लाई होती है।
क्या- क्या सावधानियां जरूरी हैं?
अमित बताते हैं कि गोबर 15-20 दिन से ज्यादा पुराना नहीं चाहिए। ऐसा होने पर गोबर में पाई जाने वाली मीथेन गैस केंचुए के लिए नुकसानदायक हो जाती है। इसके साथ ही नियमित रूप से पानी का छिड़काव जरूरी है। साथ ही बेड की ऊंचाई डेढ़ फीट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
कम लागत में ज्यादा मुनाफा कैसे कमाएं?
अमित हजारों किसानों को ट्रेंड कर चुके हैं। वे कहते हैं कि वर्मीकंपोस्ट तैयार करने के लिए बहुत ज्यादा लागत की जरूरत नहीं होती। बहुत कम लागत से इसकी शुरुआत की जा सकती है। हमें पहले एक बेड से शुरुआत करनी चाहिए। वो बेड तैयार हो जाए, तो उसी के केंचुए से दूसरी और फिर ऐसे करके तीसरी, चौथी बेड तैयार करनी चाहिए।
वर्मीकंपोस्ट बनने के बाद ऊपर से खाद निकाल ली जाती है और नीचे जो बचता है, उसमें केंचुए होते हैं। वहां से जरूरत के हिसाब से केंचुए निकालकर दूसरे बेड पर डाले जा सकते हैं। ऐसा करने से हमें बार-बार केंचुआ खरीदने की जरूरत नहीं होगी। उनके मुताबिक खाद की लागत 3 रुपए प्रति किलो आती है। वह इसे थोक में छह रुपए से लेकर बीस रुपए प्रति किलो तक बेचते हैं।
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'मैं पंजाब, नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर, सिंध और बलूचिस्तान को एक संयुक्त राज्य के रूप में देखना चाहता हूं। ब्रिटिश राज के तहत या फिर उसके बिना भी एक खुद-मुख्तार नार्थ-वेस्ट भारतीय मुस्लिम राज्य ही मुसलमानों का आखिरी मुस्तकबिल है।' 29 दिसंबर 1930 को मुस्लिम लीग के 25वें अधिवेशन में दिए गए इस भाषण को अब पाकिस्तान में 'आइडिया ऑफ पाकिस्तान' के नाम से पढ़ाया जाता है। ये भाषण दिया था मशहूर शायर सर मोहम्मद इकबाल यानी अल्लामा इकबाल ने। हालांकि, पाकिस्तान में लाहौर हाइकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस रहे उनके बेटे जस्टिस जावेद इकबाल इसका विरोध करते थे।
जस्टिस जावेद कहते थे कि 1930 के मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में इकबाल ने यह जरूर कहा था कि उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान को मिलाकर एक वृहद प्रदेश 'ब्रिटिश इंडिया' के तहत ही बनाया जाना चाहिए। मुस्लिम बहुल राज्य बनाने की इस अवधारणा को ही जानबूझकर या अनजाने में 'पाकिस्तान का ख्वाब' कहा गया।
जस्टिस जावेद कहते थे कि मेरे पिता ने 1931 में मुस्लिमों के लिए अलग राष्ट्र की मांग के विरोध में अंग्रेज हुकूमत को खत लिखा था, जो अक्टूबर 1931 में टाइम मैगजीन में भी छपा था। इस खत में उन्होंने कहा था कि मैंने ब्रिटिश इंडिया से बाहर अलग मुस्लिम स्टेट की मांग नहीं की थी। मैं तो सांप्रदायिक आधार पर पंजाब के बंटवारे के भी खिलाफ हूं, जैसा कि कुछ लोग सुझाव दे रहे हैं। असल में साइमन कमीशन की रिपोर्ट और जवाहरलाल नेहरू ने समुदायों की बहुसंख्या के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की जो वकालत की है, मैं उसी के तहत मुस्लिम बहुल प्रदेश की बात कर रहा हूं।'
अल्लामा इकबाल का जन्म 9 नवंबर 1887 को सियालकोट में हुआ था। उनके पिता शेख नूर मोहम्मद दर्जी का काम करते थे। इकबाल ने कानून, दर्शन, फारसी और अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की थी। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से 1899 में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने इसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में नौकरी की। 1904 में इकबाल अपना तराना 'सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा' लिख चुके थे और मशहूर हो चुके थे। अगले साल आगे की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए। यहां कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया। 1907 में वो म्यूनिख चले गए और वहां लुडविंग मेक्समिलियन विश्वविद्यालय से PHD की। इसके बाद उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की।
वहां से लौटे तो गवर्नमेंट कॉलेज में दो साल और पढ़ाया। उसके बाद सरकार नौकरी से इस्तीफा देकर फिर वकालत करने लगे। 1922 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि मिली। 1927 में पंजाब असेंबली के लिए चुन लिए गए। 1928-29 में अलीगढ़, हैदराबाद और मद्रास विश्वविद्यालयों में उन्होंने 6 लेक्चर दिए थे, जिनसे उनके धार्मिक विचार का पता चलता है। इकबाल के जिस भाषण को आज के पाकिस्तान में आइडिया ऑफ पाकिस्तान के तौर पर पढ़ाया जाता है। उस पाकिस्तान को इकबाल खुद नहीं देख सके। 21 अप्रैल 1938 को उनका निधन हो गया।
भारत और दुनिया में 29 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं :
2015: विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पश्चिमी अफ्रीकी देश गिन्नी को इबोला मुक्त घोषित किया। गिन्नी के एक गांव के 18 साल के युवक में सबसे पहले इबोला संक्रमण मिला था।
2004: 26 दिसंबर को आई सुनामी लहरों के कारण इंडोनेशिया में मरने वालों की संख्या 60,000 पहुंची।
1984: इंदिरा शोक लहर में कांग्रेस को आजाद भारत में सबसे बड़ी जीत मिली। 404 लोकसभा सीटों के साथ राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। आंध्र प्रदेश में पहली बार चुनाव में उतरी तेलुगु देशम पार्टी 30 सीटें जीतकर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरी।
1983: सुनील गावस्कर ने टेस्ट क्रिकेट में अपना बेस्ट स्कोर 236 रन वेस्टइंडीज के खिलाफ बनाया। चेन्नई में हुआ ये मैच सीरीज का छठवां और आखिरी मैच था। मैच ड्रॉ रहा, सीरीज वेस्टइंडीज ने 3-0 से जीती। गावस्कर मैन ऑफ द मैच रहे।
1975: ब्रिटेन में महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों से जुड़ा कानून लागू हुआ।
1972: कलकत्ता (अब कोलकाता) में मेट्रो रेल का काम शुरू हुआ।
1942: हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना का जन्म हुआ। वो एक के बाद एक 14 सुपरहिट फिल्में देकर हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार बने।
1917: प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर का जन्म हुआ। धारावाहिक 'रामायण' से देश के घर-घर में वो मशहूर हुए।
1845: अमेरिकी कांग्रेस में मंजूरी के बाद टेक्सास अमेरिका का 28वां राज्य बना।
1530: मुगल शासक बाबर के निधन के बाद उनका बेटा हुमायूं गद्दी पर बैठा।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC) के न्यू भाउपुर-न्यू खुर्जा सेक्शन का उद्घाटन करेंगे। पूरा कार्यक्रम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुबह 11 बजे किया जाएगा। इस इवेंट के दौरान ही वह प्रयागराज में EDFC के ऑपरेशनल कंट्रोल सेंटर (OCC) का भी उद्घाटन करेंगे। इस दौरान यूपी की गवर्नर आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल भी मौजूद रहेंगे।
क्या है EDFC?
ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी EDFC प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। इसे मालवाहक ट्रेनों के लिए खासतौर पर बनाया गया है। मतलब इस पर केवल माल गाड़ियां ही दौड़ेंगी। 351 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर न्यू भाउपुर- न्यू खुर्जा सेक्शन तक है। इसे 5,750 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया गया है। इसकी कुल लंबाई 1856 किलोमीटर होनी है। जो पंजाब के लुधियाना से शुरू होकर हरियाणा, यूपी, बिहार और झारखंड से होते हुए पश्चिम बंगाल के दानकुनी तक जाएगा।
इसके साथ ही केंद्र सरकार 1504 किलोमीटर लंबे वेस्टर्न कॉरिडोर का भी निर्माण करवा रही है। ये ग्रेटर नोएडा के दादरी से शुरू होकर मुंबई जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक बन रहा है। केंद्र सरकार ने आने वाले दिनों में पूरे देश में माल वाहक ट्रेनों के लिए अलग से पटरियां बिछाने का फैसला लिया है।
इससे क्या फायदा होगा?
- कानपुर, कन्नौज, कानपुर देहात, औरैया, फतेहपुर, इटावा, फिरोजाबाद, फर्रुखाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़ और आस-पास लगी इंडस्ट्री के लिए फायदेमंद साबित होगा।
- नॉर्मल रेल लाइन पर दबाव कम होगा और इससे यात्री ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जा सकेगी।
- यात्री ट्रेनों की लेटलतीफी कम होगी।
- अनाज व अन्य माल समय पर डेस्टिनेशन तक पहुंचाए जा सकेंगे।
प्रयागराज में कंट्रोल सेंटर होगा
पूरे EDFC के लिए प्रयागराज का ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर एक कमांड सेंटर की तरह काम करेगा। ये सेंटर दुनिया भर में इस तरह के सबसे बड़े स्ट्रक्चर में से एक है। इसमें आधुनिक इंटीरियर्स का इस्तेमाल किया गया है और इसका डिजाइन भी शानदार है। यह बिल्डिंग इको फ्रेंडली है।
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देश में कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों में एक नई बीमारी सामने आ रही। ये बीमारी इतनी खतरनाक है कि लोगों की जान बचाने के लिए उनके शरीर के अंग तक काटकर निकालने पड़ रहे हैं। सबसे पहले दिसंबर की शुरुआत में इसके मामले दिल्ली में सामने आए। इसके बाद गुजरात के अहमदाबाद में भी इसी तरह के मामले आने के बाद राज्य सरकार ने इससे बचने के लिए एडवाइजरी जारी की। ऐसे ही कई मामले राजस्थान, पंजाब में भी सामने आए हैं। इनमें से कुछ मरीजों की मौत हो गई तो कुछ को संक्रमण से बचाने के लिए उनकी आंखें तक निकालनी पड़ी। इस नए संक्रमण का नाम है ब्लैक फंगस।
ये नई बीमारी है क्या? इसके लक्षण क्या हैं? ये कितनी खतरनाक है? अगर ये बीमारी किसी को हो जाए तो मौत की आशंका कितनी है? इससे कैसे बच सकते हैं? आइए जानते हैं...
क्या है ब्लैक फंगस?
ये एक फंगल डिजीज है। जो म्यूकरमायोसिस नाम के फंगाइल से होता है। ये ज्यादातर उन लोगों को होता है, जिन्हें पहले से कोई बीमारी हो या वो ऐसी मेडिसिन ले रहे हों जो बॉडी की इम्यूनिटी को कम करती हों या शरीर के दूसरी बीमारियों से लड़ने की ताकत कम करती हों। ये शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है।
ये शरीर में कैसे पहुंचता है और इससे क्या असर पड़ सकता है?
ज्यादातर सांस के जरिए वातावरण में मौजूद फंगस हमारे शरीर में पहुंचते हैं। अगर शरीर में किसी तरह का घाव है या शरीर कहीं जल गया है तो वहां से भी ये इंफेक्शन शरीर में फैल सकता है। अगर इसे शुरुआती दौर में ही डिटेक्ट नहीं किया जाता है तो आखों की रोशनी जा सकती है। या फिर शरीर के जिस हिस्से में ये फंगस फैले हैं, शरीर का वो हिस्सा सड़ सकता है।
ब्लैक फंगस कहां पाया जाता है?
ये बहुत की गंभीर, लेकिन एक रेयर इंफेक्शन है। ये फंगस वातावरण में कहीं भी रह सकता है, खासतौर पर जमीन और सड़ने वाले ऑर्गेनिक पदार्थों में। जैसे पत्तियों, सड़ी लकड़ी और कम्पोस्ट खाद में ब्लैक फंगस पाया जाता है।
इसके लक्षण क्या हैं?
शरीर के जिस हिस्से में इंफेक्शन है, उस पर इस बीमारी के लक्षण निर्भर करते हैं। चेहरे का एक तरफ से सूज जाना, सिरदर्द होना, नाक बंद होना, उल्टी आना, बुखार आना, चेस्ट पेन होना, साइनस कंजेशन, मुंह के ऊपर हिस्से या नाक में काले घाव होना, जो बहुत ही तेजी से गंभीर हो जाते हैं।
ये इंफेक्शन किन लोगों को होता है, क्या इसका कोरोना से कोई कनेक्शन है?
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ये उन लोगों को होता है जो डायबिटिक हैं, जिन्हें कैंसर है, जिनका ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुआ हो, जो लंबे समय से स्टेरॉयड यूज कर रहे हों, जिनको कोई स्किन इंजरी हो, प्रिमेच्योर बेबी को भी ये हो सकता है।
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जिन लोगों को कोरोना हो रहा है उनका भी इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। अगर किसी हाई डायबिटिक मरीज को कोरोना हो जाता है तो उसका इम्यून सिस्टम और ज्यादा कमजोर हो जाता है। ऐसे लोगों में ब्लैक फंगस इंफेक्शन फैलने की आशंका और ज्यादा हो जाती है।
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कोरोना मरीजों को स्टेरॉयड दिए जाते हैं। इससे मरीज की इम्यूनिटी कम हो जाती है। इससे भी उनमें ये इंफेक्शन फैलने की आशंका ज्यादा हो जाती है।
ये फंगस कितना खतरनाक है?
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ये कम्युनिकेबल डिजीज नहीं है यानी ये फंगस एक मरीज से दूसरे मरीज में नहीं फैलता है। लेकिन, ये कितना खतरनाक है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके 54% मरीजों की मौत हो जाती है। शरीर में इंफेक्शन कहां है, उससे मोर्टेलिटी रेट बढ़ या घट सकता है।
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साइनस इंफेक्शन में मोर्टेलिटी रेट 46% होता है वहीं, फेफड़ों में इंफेक्शन होने पर मोर्टेलिटी रेट 76% तो डिसमेंटेड इंफेक्शन में मोर्टेलिटी रेट 96% तक हो सकता है। अमेरिकी एजेंसी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिपोर्ट ये कहती है। इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि ये दुनिया में होने वाले हर तरह के इंफेक्शन में म्यूकरमायोसिस इंफेक्शन के मामले सिर्फ 2% ही होते है।
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यह फंगस जिस एरिया में डेवलप होता है, उसे खत्म कर देता है। ऐसे में अगर इसका असर सिर में हो जाए तो ब्रेन ट्यूमर समेत कई तरह के रोग हो जाते हैं, जो जानलेवा साबित हो जाता है। समय पर इलाज होने पर इससे बचा जा सकता है। अगर यह दिमाग तक पहुंच जाता है तो मोर्टेलिटी रेट 80 फीसदी है। कोरोना के कारण बहुत से लोग कमजोर हो चुके हैं तो ऐसे में ये फंगल इंफेक्शन भी बढ़ा है।
इससे बचा कैसे जा सकता है?
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कंस्ट्रक्शन साइट से दूर रहें, डस्ट वाले एरिया में न जाएं, गार्डनिंग या खेती करते वक्त फुल स्लीव्स से ग्लव्ज पहने, मास्क पहने, उन जगहों पर जाने बचें जहां पानी का लीकेज हो, जहां ड्रेनेज का पानी इकट्ठा हो वहां न जाएं।
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जिन लोगों को कोरोना हो चुका है उन्हें पॉजिटिव अप्रोच रखना चाहिए। कोरोना ठीक होने के बाद भी रेगुलर हेल्थ चेकअप कराते रहना चाहिए। अगर फंगस से कोई भी लक्षण दिखें तो तत्काल डॉक्टर के पास जाना चाहिए। इससे ये फंगस शुरुआती दौर में ही पकड़ में आ जाएगा और इसका समय पर इलाज हो सकेगा।
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इलाज में थोड़ी सी भी देरी से मरीज के शरीर का वो हिस्सा जहां ये फंगल इंफेक्शन हुआ है, वह सड़ने लगता है। इस स्थिति में उसे काटकर निकालना पड़ सकता है। ऐसा नहीं करने पर मरीज की जान भी जा सकती है।
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JEE और NEET के कॉम्पीटिटिव एग्जाम की तैयारी कर रहे बच्चों में इसे लेकर बहुत कन्फ्यूजन थी। कब होगा, कैसे होगा, सिलेबस क्या होगा, पैटर्न और मोड क्या रहेगा? ये कुछ ऐसे सवाल थे जिसका जवाब किसी के पास नहीं था और इसके चलते बच्चों में एंग्जाइटी और तनाव देखने को मिला। किसी के पास जवाब हो भी नहीं सकता था, यह सबकुछ तय करने की जिम्मेदार सरकार और टेस्टिंग एजेंसी NTA की थी।
अब सरकार और NTA ने JEE को लेकर सबकुछ तय कर दिया है। लेकिन उसमें नया क्या है? क्या है जो पिछली बार नहीं था पर इस बार के एक्जाम में होगा? कुछ चीजें बदलीं हैं जो शायद आप में से बहुतों को पता हो, लेकिन क्या आप जानते हैं कि JEE का एक्जाम पैटर्न बदल गया है? आपने जो सवाल NTA से पूछे थे उसका जवाब क्या है? क्या इस बार फ्री कोचिंग की व्यवस्था भी है?
इंदौर में JEE की तैयारी करा रहे, विवेक शर्मा बताते हैं कि सरकार ने सिलेबस तो नहीं बदला, लेकिन पैटर्न जरूर बदल दिया, जिससे बच्चों को फायदा होगा। इस पैटर्न से टेस्ट सबके लिए फेयर हो जाएगा, जिसने पूरा सिलेबस पढ़ा है उसके लिए भी और जिसने सिलेबस पूरा नहीं पढ़ा उसके लिए भी।
आपके सवालों पर NTA ने क्या जवाब दिया?
दरअसल NTA की वेबसाइट पर बच्चों ने JEE 2021 को लेकर कुछ सवाल पूछे थे। इन में से जो सवाल सबसे ज्यादा बार पूछे गए NTA ने उनका एक सेट जारी किया है, वह भी जवाब समेत।
आपके सवाल - “JEE में मल्टीपल सेशन का हमें क्या फायदा?
NTA का जवाब - इससे बच्चों को कई मौके अच्छा करने के कई अवसर मिलेंगे। बच्चा पहले अटेंप्ट में अगर अच्छा नहीं कर पाया तो वह अगले में अपनी गलतियों को सुधार सकता है। इसी क्रम में हर कैंडिडेट के पास अपना बेस्ट देने के 4 अवसर मिलेंगे।
आपके सवाल - क्या हर सेशन में बैठने के लिए अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे?
NTA का जवाब - नहीं ऐसा नहीं है। एक ही एप्लिकेशन फॉर्म से कैंडिडेट एक या एक से ज्यादा सेशन के अप्लाई कर सकता है। बस फॉर्म भरने के दौरान उसे बस ये भरना होगा कि कैंडिडेट किस-किस सेशन में हिस्सा लेना चाहता है।
आपके सवाल - क्या एक्जाम पैटर्न बदला है?
NTA का जवाब - हां एक्जाम पैटर्न में कुछ बदलाव किए गए हैं। इससे उन बच्चों को लाभ मिलेगा जिनके बोर्ड ने सिलेबस को छोटा कर दिया था और वे सबकुछ नहीं पढ़ सके थे। अब 75 की जगह 90 सवाल पूछे जाएंगे, लेकिन अटेंप्ट सिर्फ 75 सवाल ही करने हैं। (हम आपको एक्जाम पैटर्न डिटेल में बता रहे हैं )
पैटर्न में नया क्या है?
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सरकार बच्चों का सिलेबस वाला कन्फ्यूजन समय रहते दूर नहीं कर पाई, लेकिन पैटर्न ऐसा दिया है कि किसी बच्चे का नुकसान न हो। हर बार सभी सब्जेक्ट्स (फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ्स) से 25-25 सवाल पूछे जाते थे, लेकिन इस बार इनकी संख्या बढ़ा कर 90 कर दी गई है।
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इन तीनों विषयों में से 25 के बजाय 30 सवाल पूछे जाएंगे, लेकिन करने 25 ही हैं। वो कैसे ? हम आपको बताते हैं, हर विषय से 30 सवाल आएंगे, जिसमें से 20 MCQ होंगे 10 और न्यूमेरिकल होंगे। MCQ आपको 20 के 20 यानी सारे ही करने हैं, जबकि न्यूमेरिकल 10 में 5, यानी न्यूमेरिकल में आपके पास विकल्प रहेगा।
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सरकार ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि CBSE समेत कुछ स्टेट बर्ड्स ने भी अपना सिलेबस छोटा कर दिया था यानी बच्चों ने पूरा नहीं पढ़ा। जबकि, JEE के सिलेबस में कोई बदलाव नहीं हुआ, ऐसे में जिन बच्चों ने पूरा सिलेबस कवर किया है, उन्हें फायदा तो रहेगा ही। सरकार ने इस बात को ध्यान में रखते हुए विकल्प दे दिया, यानी बच्चों ने जो नहीं पढ़ा है, उसे छोड़कर जो पढ़ा है, उसे अटेंप्ट कर सकते हैं।
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एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पेपर ऐसा डिजाइन किया जाएगा कि किसी बच्चे को नुकसान न हो। न्यूमेरिकल में कोई माइनस मार्किंग भी नहीं है। इसके अलावा सरकार के इस निर्णय से बच्चों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
फ्री ऑनलाइन कोचिंग की भी व्यवस्था
- सरकार का एक कार्यक्रम है दीक्षा। इसके तहत देश की तमाम भाषाओं में 12वीं कक्षा के लिए सीबीएसई, एनसीआरटी और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा तैयार की गई 80 हजार ई-बुक्स उपलब्ध हैं। इसके अलावा 12 वीं के बाद के सभी कॉम्पीटिटिव एक्जाम के लिए भी यहां अलग से E-नोट्स उपलब्ध हैं। स्टडी मेटेरियल को क्यूआर कोड के माध्यम से भी देखा जा सकता है। इस ऐप को IOS और गूगल प्ले स्टोर के जरिये डाउनलोड किया जा सकता है।
- NTA हर साल 2 से 3 हजार केंद्रों पर फ्री कोचिंग देता था। लेकिन इस बार कोरोना के चलते यह कोचिंग नहीं चल रही है। लेकिन, NTA की वेबसाइट पर स्टडी मेटेरियल उपलब्ध करवाए जा रहे हैं।साथ ही NTA की वेबसाइट पर जाकर आप वीडियो लेक्चर भी ले सकते हैं। NTA की वेबसाइट पर अलग- सब्जेक्ट के वीडियो लेक्चर उपलब्ध हैं।
JEE का शेड्यूल क्या है?
JEE यानी IIT की प्रवेश परीक्षाएं पहली बार 4 फेज में होंगी। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हर साल करीब 12 से 15 लाख बच्चे JEE के एग्जाम में बैठते है। लेकिन, इस बार इनकी संख्या बढ़ सकती है, कोरोना के कारण पिछले साल कई हजार बच्चे JEE के एग्जाम में नहीं बैठ पाए थे, जो इस बार जरूर बैठेंगे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए और कोरोना के मद्देनजर सरकार ने पहली बार JEE की परीक्षा 4 फेज में करवाने का फैसला लिया है।

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पहले फेज के लिए NTA ने ऑनलाइन एप्लिकेशन फॉर्म लेना शुरू कर दिया है। इसकी लास्ट डेट 16 जनवरी 2020 है। 19 जनवरी को करेक्शन के लिए पोर्टल खुलेगा, जिसके जरिए एप्लिकेशन फॉर्म में हुई गलतियों को सुधारने का मौका मिलेगा।
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विवेक शर्मा कहते हैं कि 4 अटेंप्ट का मौका होने से बच्चों में स्ट्रेस कम हुआ है, अगर पहले फेज में बैठने वाले बच्चे का एग्जाम ठीक नहीं हुआ तो उसके पास 3 और मौके होंगे।
NEET का शेड्यूल क्या है?
NEET के एंट्रेंस एग्जाम गर्मियों में होते हैं। इसे लेकर भी बच्चों में कन्फ्यूजन था। जैसे कितने फेज में होगा और कब। इसमें JEE की तुलना में बहुत कम बच्चे बैठते हैं इसलिए इसका एग्जाम वैसे ही होगा जैसे पहले होता आया है। MHRD ने जानकारी दी है कि मार्च में ऑनलाइन एप्लिकेशन फॉर्म लिए जाएंगे, जबकि ऑनलाइन करेक्शन अप्रैल में होगा और मई में एडमिट कार्ड मिलेगा। बाकी की जानकारी जनवरी के आखिरी हफ्ते या फरवरी 2021 तक जारी की जाएगी।
सिलेबस में कोई बदलाव हुआ या नहीं?
कोरोना के मद्देनजर CBSE ने अपना सिलेबस छोटा कर दिया था। खबरें आने लग गईं थीं कि सरकार JEE और NEET का सिलेबस छोटा कर सकती है। बच्चे क्या पढ़ें और क्या छोड़ें में काफी कन्फ्यूज थे। कुछ बच्चों ने CBSE के हिसाब से IIT की तैयारी भी शुरू कर दी थी, लेकिन सरकार ने साफ़ कर दिया कि सिलेबस में कोई बदलाव नहीं होगा।


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